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संदेश

भरोसे की नींद

भरोसे की नींद दूसरे को चैन से सोते देख मेरे भीतर भी अजीब-सी नमी उतर आती है। मानो किसी ने दुनिया को बता दिया हो कि शांति अभी मरी नहीं है, भरोसे की गोद में कोई अब भी निश्चिंत लेटा हुआ है। किशोरों को खेलते देख मेरा अपना बीता हुआ समय हवा की तरह लौट आता है। किसी घर में बुजुर्गों का मुस्कुराना, मानो मुझे धरती पर स्वर्ग होने की गवाही देता है। और जब कोई बच्चा अपने पिता के कंधे पर झूमता है— तो दृश्य ऐसा लगता है जैसे कोई हरा-भरा पेड़ बरसात में भीगकर कृतज्ञ हो गया हो। वह झूमना केवल खेल नहीं, भरोसे का उत्सव है। ये सब क्षण किसी किताब में लिखे प्रमाण नहीं हैं— ये स्वयं जीवन की लिखावट हैं, जहाँ आँखें और दिल मिलकर एक ही बात कहते हैं: यही है सच, यही है जीवन। — अविनाश पाण्डेय

लौटती हुई शुरुआत

लौटती हुई शुरुआत  ........................ मैंने जाना है— हमेशा एक नई शुरुआत की जा सकती है। हर अंत अदृश्य सीढ़ी पर रखा पहला पाँव है। अंधकार का भार सिर्फ़ उतनी देर तक टिकता है, जितनी देर प्रकाश अपनी साँस भर रहा होता है। हर कठिनाई का अंत सुनिश्चित है – हर सुख का अंत भी सुनिश्चित है। सुबह— घड़ी की सुई नहीं, बल्कि एक रहस्य है जो हर बार अलग चेहरे में लौटता है। समाधान कोई उत्तर नहीं, वह तो एक रंग है— पहली किरण की लालिमा, जो हर छाया को धीरे-धीरे निगल लेती है। कठिनाई का अंत? वह अंत नहीं, बल्कि एक दर्पण है जिसमें जीवन अपना अगला चेहरा देख लेता है। — अविनाश पाण्डेय

हवाओं पर लिखी गई स्त्री

"हवाओं पर लिखी गई स्त्री " ------------------------------------ प्रेम में अक्सर समझदारी खो जाती हैं। खो जाते हैं पुराने चेहरे। दुनिया सिमटकर एक आवाज़, एक छवि, एक छुअन में कैद हो जाती है। प्रेम में डूबी स्त्री का संसार बदल जाता है। वो भावनाओं की विशाल सरहद में, नींद और जाग के बीच खुशहाल प्रेम और मुस्कुराते प्रेमी का सपना बुनने लगती है। वो हवाओं से बातें करती है, बुदबुदाकर मौसम की नाव से संदेश भेजा करती है। वो चाहती है कि उसका प्रेमी कभी न हारे— और उसे जिताने के लिए अपना सर्वस्व दाँव पर लगा देती है। वो हवाओं के संग उड़ना चाहती हुआ है – कभी तेज, कभी मद्धम। किसी ऐसी जगह जाना चाहती है जहाँ उसकी भावनाओं का एक विशाल साम्राज्य हो— बादलों का रंग-बिरंगे पंख लगाकर वो जानना चाहती है कि उसका प्रेमी  कितनी दूर ले जा सकता है। वो चिड़िया की तरह होती है— उड़ान उसकी फितरत होती है, आज़ादी उसकी साँसों में। और वह चाहती है कि उसका प्रेमी भी बदलते आसमान को छू ले, उसके संग उड़ान भरे। कल्पनाओं में तिनका-तिनका जोड़कर वो एक महल बनाती है— प्रेम के, प्रतीक्षा के, भविष्य के। पर जब प्रेमी की आँखों में अपने...

चीजों को टालना या इग्नोर करना

कई बार चीजों को टालना या #इग्नोर करना बहुत महंगा पड़ता हैं। कई बार हम सोचते हैं — अभी नहीं, बाद में देखेंगे। लेकिन यही "बाद में" धीरे-धीरे हमारी ज़िंदगी का बोझ बन जाता है। हर दिन की ओवरथिंकिंग, जो हम हल्के में लेते हैं, धीरे-धीरे अंदर ही अंदर डिप्रेशन की शक्ल ले लेती है। जो बात आज सुलझाई जा सकती थी, वो अनकहेपन में उलझकर कल एक दूराव बन जाती है। छोटा-सा उधार, जो "अभी नहीं, बाद में" टाल दिया, वो कब बड़ा कर्ज बन गया, पता ही नहीं चला। बदन का एक मामूली दर्द, जिसे इग्नोर किया, वो कब बीमारी में बदल गया, वो रिपोर्ट ही बता पाई। हम सोचते हैं — वक्त है, संभाल लेंगे। पर वक्त कभी थमता नहीं, और जिन चीजों को हम टालते हैं, वो अक्सर हमें नहीं टालतीं। इसलिए जब अगली बार मन करे कुछ "कल पे टालने" का, तो बस इतना याद कर लेना — कहीं वो कल, आज से ज़्यादा भारी न हो जाए। कहीं जो हल्का लगा था, वही सबसे बड़ा बोझ न बन जाए। Avinash Pandey  #ऑथर #मोटिवेशन #जीवन #आर्टोफ्लाइफ #माइंड #साइकोलॉजी

वो जो हम पीछे छोड़ आए

कल के साए में आज — अविनाश पाण्डेय आसान नहीं होता, किसी के जीवन में आख़िरी मुहब्बत बनना। तुम्हें सिर्फ़ उसका आज नहीं, उसका गुज़रा हुआ कल भी सँभालना पड़ता है— वो पुरानी मोहब्बतें, जिनकी खुशबू अब भी उसके कमरे की हवा में तैरती है। उन कहानियों को सुनना होता है जिनमें तुम्हारा कोई किरदार नहीं। तुम्हें उसकी आँखों में वो परछाईं भी देखनी होती है जो तुम्हारी नहीं, मगर अब भी वहाँ है। तुम उसके साथ चलते हो उन पगडंडियों पर जहाँ उसके कदम पहले किसी और के साथ धंसे थे। उसकी हँसी में, उसके स्पर्श में, उसकी गंध में— कहीं न कहीं, किसी और का मौसम अब भी बचा होता है। और तुम यह जानते हुए भी कि उसका अतीत तुम्हारा नहीं, उसके आने वाले दिनों में अपना स्वाद, अपनी खुशबू, अपना स्पर्श धीरे-धीरे घोलते हो— जैसे कोई रात में, बिना आहट, किसी ठंडे होते जिस्म को अपनी धड़कनों की ऊष्मा से फिर से जगा दे।

कल के साए में आज

कल के साए में आज — अविनाश पाण्डेय आसान नहीं होता, किसी के जीवन में आख़िरी मुहब्बत बनना। तुम्हें सिर्फ़ उसका आज नहीं, उसका गुज़रा हुआ कल भी सँभालना पड़ता है— वो पुरानी मोहब्बतें, जिनकी खुशबू अब भी उसके कमरे की हवा में तैरती है। उन कहानियों को सुनना होता है जिनमें तुम्हारा कोई किरदार नहीं। तुम्हें उसकी आँखों में वो परछाईं भी देखनी होती है जो तुम्हारी नहीं, मगर अब भी वहाँ है। तुम उसके साथ चलते हो उन पगडंडियों पर जहाँ उसके कदम पहले किसी और के साथ धंसे थे। उसकी हँसी में, उसके स्पर्श में, उसकी गंध में— कहीं न कहीं, किसी और का मौसम अब भी बचा होता है। और तुम यह जानते हुए भी कि उसका अतीत तुम्हारा नहीं, उसके आने वाले दिनों में अपना स्वाद, अपनी खुशबू, अपना स्पर्श धीरे-धीरे घोलते हो— जैसे कोई रात में, बिना आहट, किसी ठंडे होते जिस्म को अपनी धड़कनों की ऊष्मा से फिर से जगा दे।

कही ईश्वर चुप ना हो जाए

मैं गलत करने से इसीलिए बचता हूँ कि ईश्वर नाराज़ होकर मुझे दंड देगा—ऐसा नहीं। मैं बचता हूँ इसलिए कि कहीं उसे बुरा न लगे। उसने मेरे भीतर एक भरोसा बोया है, एक यक़ीन कि मैं अंधेरे में भी उसके दिए उजाले को थामे रहूँगा। अगर मैंने उस भरोसे को तोड़ दिया, तो शायद वह चुप हो जाएगा— और उसकी वह चुप्पी मेरी सबसे बड़ी सज़ा होगी। — अविनाश पाण्डेय