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अविनाश पाण्डेय। प्रेम। कृष्ण। राधा। गोकुल। पवित्र प्रेम। लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

प्रेम में मुस्कुराना

कृष्ण एक मुस्कुराता हुआ प्रेमी। ************************** प्रेम शब्द ही जैसे मुझे कृष्णा की तरफ खींच ले जाता हैं। कृष्ण का जीवन जैसे परमात्मिक जीवन। अच्छे बुरे का कोई चुनाव नही। एक छोर– जहां अच्छे और बुरे दोनों आकर मिलते हैं।   ओशो पुरम में प्रेम पर अक्सर चर्चा होती थी और प्रेम सिमट कर कृष्ण के ऊपर आ जाता था। जैसे कृष्ण को परिभाषित नहीं किया जा सकता वैसे ही प्रेम को परिभाषित नहीं किया जा सकता, क्योंकि शब्दो से सत्य प्रकट नही हो सकता अपितु शब्दो से इसका आभास जरूर मिलता हैं। सबका एक मत था, चाहे वो अमेरिकन हो, यूरोपियन हो चाहे भारतीय। प्रेम परमात्मीक हैं। प्रेम का मतलब कृष्ण है। एक मुस्कुराता हुआ प्रेमी जिन्होंने प्रेम को जिया और अमर कर दिया।  प्रेम मुक्त करता है। स्वतंत्रता लाता हैं। मुस्कुराहटे बड़ी करता हैं। ऐसे प्रेम को जीसस ने ईश्वर कहा हैं। बुद्ध ने ध्यान की अंतिम परिणीति कहा हैं। महावीर ने केवल्य का स्वभाव कहा।  तभी तो कृष्ण ताउम्र मुस्कुराते रहे इसके वावजूद की वो गुकुल से दूर रहें।  एक बार जो  प्रेम की गलियां छूटी फिर पलट कर देखा तक नहीं।  शायद प...