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संदेश

Social homeostasis

जब बुद्ध वर्षों बाद ज्ञान प्राप्त करके पहली बार कपिलवस्तु लौटे, तो उनके पिता ने बुद्ध को नहीं देखा; उन्होंने उसी पुराने सिद्धार्थ को खोजा, जिसे वे पहचानते थे। कहते हैं, उन्होंने लगभग यही कहा—"यह कैसा भेष बना लिया है? अब लौट ही आए हो, तो इसे उतार दो। मैं तुम्हें माफ़ कर दूँगा।" यहीं से मनुष्य के मन का एक गहरा नियम सामने आता है—लोग आपके परिवर्तन का विरोध नहीं करते, वे अपनी परिचित दुनिया के टूटने का विरोध करते हैं। सामाजिक मनोविज्ञान बताता है कि हर समूह एक अदृश्य Social Homeostasis बनाए रखता है। हर व्यक्ति के लिए एक स्वीकृत पहचान, एक अनुमानित ऊँचाई और एक सुविधाजनक भूमिका तय हो जाती है। जब तक आप उसी दायरे में रहते हैं, आपको स्वीकार किया जाता है। लेकिन जैसे ही आपकी चेतना उस सीमा को पार करती है, प्रतिरोध शुरू हो जाता है। Leon Festinger की Social Comparison Theory के अनुसार, आपकी प्रगति अनायास ही दूसरों के लिए आत्म-मूल्यांकन का दर्पण बन जाती है। वहीं Status Threat बताता है कि जब किसी स्थापित पदानुक्रम को चुनौती महसूस होती है, तो वह अपने बचाव में प्रतिक्रिया करता है। और Pierre Bourdi...
हाल की पोस्ट

मै कुछ कहना चाहता हूँ —सुनोगे?

मै कुछ कहना चाहता हूँ - सुनोगे?  पहले मै बातूनी था। जीभ ओवरटाइम करता था और दिमाग हड़ताल पर चला जाता था।  फिर चुप हो गया।  इस चुप और बातूनी के बीच हमेशा संघर्ष चलता रहता था। एक दिन इन दोनों के बीच सुलह हो गया। अब मैं दोनों के मध्य बैठ कर कुछ बोलना चाहता हूँ - सुनना पड़ेगा वरना मैं भी नहीं सुनूंगा। कुछ लोगों का हमेशा मेरे से एक शिकायत रहती हैं - फोन नहीं करते, उठाते नहीं। पास बैठो तो जल्दी भाग जाते हो। पता चलता हैं कि घर में हो और मिलते नहीं? तुम पकड़ाते ही नहीं? अब क्या बोलूं कि जब भी फोन उठाओ - आप सुनाने लगते हो अपनी कथा। जब भी पास बैठो - आपको अपनी सुनाने के अलावा दूसरे का सुनना आता नहीं।  आखिर जब सुनने का ही ऑप्शन हैं तो बेस्ट क्यों न सुने?  #joerogan को क्यों ना सुने, Dairy of a CEO क्यों ना सुने?  क्यों न सुने #RottenMango को और #modernwisdompodcast को?  तो भाई साहब हमने कोई ठेका नहीं ले रखा हैं आपके #हैलुसिनेशन और #डिसीज़_ऑफ_मी का!  अगर आपको कुछ बोलना हैं तो सुनना भी पड़ेगा।

संगत और जीवन

मनुष्य जिस संगत में अधिक समय बिताता है, वह अनजाने में उसी जैसा होने लगता है। पहले उसकी भाषा बदलती है, फिर सोच, और अंत में उसे अपने भीतर हो रहे बदलाव भी सामान्य लगने लगते हैं। मैंने देखा है कि बुरी संगत इंसान को एक दिन में नहीं बदलती। वह धीरे-धीरे उसकी संवेदनशीलता कम करती है। गलत बातों पर भीतर उठने वाली बेचैनी को खत्म कर देती है। फिर एक समय ऐसा आता है जब वही गलत चीज़ें आदत बन जाती हैं। सबसे खतरनाक बात यह है कि इंसान को अपना पतन, पतन जैसा लगना ही बंद हो जाता है। उसे लगता है कि यही उसका स्वभाव है। और अब मुझे लगता है कि संगत सिर्फ लोगों की नहीं होती — विचारों की भी होती है, भीड़ की भी, और उस वातावरण की भी, जहाँ सत्य से अधिक सुविधा को महत्व दिया जाता है। Avinash Pandey 

कुछ रातें

Pain of Discipline or pain of Regret

डियर युवा, जीवन में आपको दो तरह के दर्द में से किसी एक दर्द का चुनाव करने पड़ेंगे। एक अनुशासन ( Discipline) का दर्द और दूसरा पछतावा( Regret ) वाली दर्द। अनुशासन वाली दर्द लिमिटेड होगी और दिन पर दिन कम होती जाएगी पर ये पछतावा वाली दर्द इसके उल्टा दिन पर दिन बढ़ते जाएगी।  तय आपको करना है कि कौन सा दर्द आप चुनेंगे।

Elpenor

Elpenor — वह जो ऊँचे सपने तो देखता है, पर कई बार अपनी ही असावधानी से उनसे गिर पड़ता है। मुझे अपने जीवन में कई Elpenor याद हैं। हर बार थोड़ा और यक़ीन से सपने बुनता हुआ, और हर बार किसी अदृश्य चूक से उन्हें खोता हुआ। समय बीतता गया, पर भीतर एक Hiraeth बचा रहा—उस घर, उस समय, उस अपनेपन की स्मृति, जहाँ लौटना अब संभव नहीं था। शायद इसी भटकन के बीच Acedia ने भी अपना घर बना लिया—आत्मा की वह थकान, जहाँ इच्छाएँ भी धीरे-धीरे अपनी आवाज़ खो देती हैं। दिन बीतते रहे, पर भीतर कोई हलचल नहीं हुई। जैसे मैं अपने ही जीवन के किनारे बैठा, उसे दूर से घटित होते हुए देख रहा था। फिर भी सब कुछ समाप्त नहीं हुआ। राख, समय और रिक्तताओं के नीचे कुछ Sempiternal बचा रहा—एक ऐसी लौ, जो नित्य नहीं, पर अंतहीन है; जो बुझ-बुझकर भी बनी रहती है। उसी की क्षीण रोशनी में मैंने अपने बिखरे हुए हिस्सों को फिर से पहचाना। और जब कई बार लगा कि अब समझौता कर लेना चाहिए, तब भीतर की Intransigence ने धीरे से सिर उठाया—वह अड़ियल जिद नहीं, बल्कि अपने सत्य से न हटने का साहस। शायद मैं इन्हीं पाँच शब्दों के बीच कहीं खड़ा हूँ — कुछ सपनों से गिरना, एक ...

सोशल मीडिया का ब्रांड

सोशल मीडिया में हर व्यक्ति एक ब्रांड है— ख़ुद से अलग दिखने की हड़बड़ी में धीरे-धीरे एक जैसा होता हुआ। बाहरी रूप ही सत्य है, अंदर झाँकना अब अप्रासंगिक है। हम शब्दों के ज़रिये मौजूद हैं, तस्वीरों के ज़रिये तय किए जाते हैं। हमारी तस्वीरें हमारी होकर भी हमसे अलग बोलती हैं। हम अति-संपर्क के समाज में जी रहे हैं। संवाद अब ज़रूरत नहीं, एक आदत है— और आदत अक्सर सोच को खा जाती है। दिखना ज़्यादा ज़रूरी है, देखना लगभग ग़ायब हैं।  हम रिश्तों के विस्तार के भ्रम में हैं, जबकि हर कोई अपने छोटे से कुएँ में खड़ा है— नदी होने का भ्रम पाले। वही चेहरे, वही आवाज़ें, उन्हीं को सच मान लेने की सुविधा। हम लगातार रौंदे जाते हैं, फिर खड़े हो जाते हैं— यह जाने बिना कि हर बार कुछ कम बचता है। ऑफ़लाइन होकर भी हम भीतर से ऑनलाइन रहते हैं। यह टापुओं की दुनिया है, जहाँ हम अपने जैसे लोगों में सबसे सुरक्षित महसूस करते हैं। यहीं सियासी जलदस्यु जन्म लेते हैं, और हम अनजाने में उनकी भीड़ बन जाते हैं। युद्ध कोई नई बात नहीं – युद्ध चल रहा है। युद्ध होगा।  युद्ध पहले भी हुए थे। लेकिन युद्ध के नाम पर  दिमा...