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संदेश

संगत और जीवन

मनुष्य जिस संगत में अधिक समय बिताता है, वह अनजाने में उसी जैसा होने लगता है। पहले उसकी भाषा बदलती है, फिर सोच, और अंत में उसे अपने भीतर हो रहे बदलाव भी सामान्य लगने लगते हैं। मैंने देखा है कि बुरी संगत इंसान को एक दिन में नहीं बदलती। वह धीरे-धीरे उसकी संवेदनशीलता कम करती है। गलत बातों पर भीतर उठने वाली बेचैनी को खत्म कर देती है। फिर एक समय ऐसा आता है जब वही गलत चीज़ें आदत बन जाती हैं। सबसे खतरनाक बात यह है कि इंसान को अपना पतन, पतन जैसा लगना ही बंद हो जाता है। उसे लगता है कि यही उसका स्वभाव है। और अब मुझे लगता है कि संगत सिर्फ लोगों की नहीं होती — विचारों की भी होती है, भीड़ की भी, और उस वातावरण की भी, जहाँ सत्य से अधिक सुविधा को महत्व दिया जाता है। Avinash Pandey 
हाल की पोस्ट

कुछ रातें

Pain of Discipline or pain of Regret

डियर युवा, जीवन में आपको दो तरह के दर्द में से किसी एक दर्द का चुनाव करने पड़ेंगे। एक अनुशासन ( Discipline) का दर्द और दूसरा पछतावा( Regret ) वाली दर्द। अनुशासन वाली दर्द लिमिटेड होगी और दिन पर दिन कम होती जाएगी पर ये पछतावा वाली दर्द इसके उल्टा दिन पर दिन बढ़ते जाएगी।  तय आपको करना है कि कौन सा दर्द आप चुनेंगे।

Elpenor

Elpenor — वह जो ऊँचे सपने तो देखता है, पर कई बार अपनी ही असावधानी से उनसे गिर पड़ता है। मुझे अपने जीवन में कई Elpenor याद हैं। हर बार थोड़ा और यक़ीन से सपने बुनता हुआ, और हर बार किसी अदृश्य चूक से उन्हें खोता हुआ। समय बीतता गया, पर भीतर एक Hiraeth बचा रहा—उस घर, उस समय, उस अपनेपन की स्मृति, जहाँ लौटना अब संभव नहीं था। शायद इसी भटकन के बीच Acedia ने भी अपना घर बना लिया—आत्मा की वह थकान, जहाँ इच्छाएँ भी धीरे-धीरे अपनी आवाज़ खो देती हैं। दिन बीतते रहे, पर भीतर कोई हलचल नहीं हुई। जैसे मैं अपने ही जीवन के किनारे बैठा, उसे दूर से घटित होते हुए देख रहा था। फिर भी सब कुछ समाप्त नहीं हुआ। राख, समय और रिक्तताओं के नीचे कुछ Sempiternal बचा रहा—एक ऐसी लौ, जो नित्य नहीं, पर अंतहीन है; जो बुझ-बुझकर भी बनी रहती है। उसी की क्षीण रोशनी में मैंने अपने बिखरे हुए हिस्सों को फिर से पहचाना। और जब कई बार लगा कि अब समझौता कर लेना चाहिए, तब भीतर की Intransigence ने धीरे से सिर उठाया—वह अड़ियल जिद नहीं, बल्कि अपने सत्य से न हटने का साहस। शायद मैं इन्हीं पाँच शब्दों के बीच कहीं खड़ा हूँ — कुछ सपनों से गिरना, एक ...

सोशल मीडिया का ब्रांड

सोशल मीडिया में हर व्यक्ति एक ब्रांड है— ख़ुद से अलग दिखने की हड़बड़ी में धीरे-धीरे एक जैसा होता हुआ। बाहरी रूप ही सत्य है, अंदर झाँकना अब अप्रासंगिक है। हम शब्दों के ज़रिये मौजूद हैं, तस्वीरों के ज़रिये तय किए जाते हैं। हमारी तस्वीरें हमारी होकर भी हमसे अलग बोलती हैं। हम अति-संपर्क के समाज में जी रहे हैं। संवाद अब ज़रूरत नहीं, एक आदत है— और आदत अक्सर सोच को खा जाती है। दिखना ज़्यादा ज़रूरी है, देखना लगभग ग़ायब हैं।  हम रिश्तों के विस्तार के भ्रम में हैं, जबकि हर कोई अपने छोटे से कुएँ में खड़ा है— नदी होने का भ्रम पाले। वही चेहरे, वही आवाज़ें, उन्हीं को सच मान लेने की सुविधा। हम लगातार रौंदे जाते हैं, फिर खड़े हो जाते हैं— यह जाने बिना कि हर बार कुछ कम बचता है। ऑफ़लाइन होकर भी हम भीतर से ऑनलाइन रहते हैं। यह टापुओं की दुनिया है, जहाँ हम अपने जैसे लोगों में सबसे सुरक्षित महसूस करते हैं। यहीं सियासी जलदस्यु जन्म लेते हैं, और हम अनजाने में उनकी भीड़ बन जाते हैं। युद्ध कोई नई बात नहीं – युद्ध चल रहा है। युद्ध होगा।  युद्ध पहले भी हुए थे। लेकिन युद्ध के नाम पर  दिमा...

ऐंकरिंग इफेक्ट्स

मैच शुरू होने से पहले रोनाल्डो का वह ऊँचा जंप। माइकल फेल्प्स का पानी में उतरने से पहले किया गया रिवर्स फ्लैप। मुहम्मद अली की आवाज़— “I am the greatest.” और उसेन बोल्ट का लाइटनिंग पोज़। ये शो ऑफ नहीं हैं। ये मानसिक स्टार्ट बटन हैं। इसे कहते हैं — Anchoring Effect। सुपर एथलीट्स जानते हैं कि दिमाग को हर बार मोटिवेट नहीं किया जाता, उसे प्रोग्राम किया जाता है। क्लासिक कंडीशनिंग पर हुए प्रयोग बताते हैं कि जब आप किसी खास भावना को बार-बार किसी खास ट्रिगर से जोड़ते हैं, तो कुछ समय बाद वह ट्रिगर अकेले ही वही भावना जगा देता है। जैसे स्विच ऑन करते ही लाइट जलती है। माइकल फेल्प्स कहते हैं — रिवर्स फ्लैप के बाद सब कुछ ऑटोमैटिक हो जाता है। मतलब? रिचुअल खत्म, मशीन शुरू। आप भी अपना “सक्सेस स्विच” बना सकते हैं — सिर्फ 3 स्टेप में: 1. Choose your emotion कौन सी फीलिंग चाहिए? कॉन्फिडेंस? फोकस? आक्रामक ऊर्जा? 2. Choose your trigger कोई पोज़, कोई शब्द, कोई गाना, कोई खास हैंड जेस्चर। 3. Practice Emotion + Trigger बार-बार उसी भावना को उसी ट्रिगर के साथ जोड़िए। दिमाग इसे लिंक कर लेगा। फिर एक दिन — स्टेज पर जाने...

एंटरटेनमेंट एंटरटेनमेंट एंड एंटरटेनमेंट

भारत का आदमी एंटरटेनमेंट चाहता है ! उसे डेवलपमेंट से मतलब नहीं है !  चाहे वह बाहरी डेवलपमेंट हो या भीतरी ! उसकी इंद्रियां रस चाहती हैं -  उत्तेजक, रोमांचक रस !  विशेषकर मानसिक रस ! जैसे कुत्ता दिनभर बैठा हड्डी चबाता है, वैसे ही भारत का आदमी घंटों बैठा एंटरटेनमेंट चबाता है !! वह न्यूज़ चबाता है, टेलीविज़न सीरियल चबाता है ! वेब सीरीज चबाता है ! रील्स चबाता है. वर्चुअल गेम्स और पोर्न चबाता है ! कुछ नहीं है तो वह गुटखा, पान, सुपारी चबाता है ! स्वाभाविक है, जो चबाता है वह थूकता भी है ! तो जिस तरह वह जगह-जगह गुटखा और पान थूकता है, उसी तरह वह हर जगह अपने चबाए विचार भी थूकता है !! धर्म चबा लिया.. तो धर्म थूकता है !   ज्ञान चबा लिया..तो ज्ञान थूकता है ! विचारधारा चबा ली.. तो विचारधारा थूकता है ! ख्याल रहे, थूकी वही चीज जाती है जो गुटकी नहीं जाती !!! हम भोजन नहीं थूकते क्योंकि भोजन गुटक  लिया जाता है ! भोजन पचा लिया जाता है ! पचा लेने से पोषण मिलता है, जो अंग लगता है! हम लोग धर्म नहीं गुटकते, ज्ञान नहीं गुटकते  !! अगर गुटकते, तो वह पचता ! पचता तो अंग...