सोशल मीडिया में हर व्यक्ति एक ब्रांड है— ख़ुद से अलग दिखने की हड़बड़ी में धीरे-धीरे एक जैसा होता हुआ। बाहरी रूप ही सत्य है, अंदर झाँकना अब अप्रासंगिक है। हम शब्दों के ज़रिये मौजूद हैं, तस्वीरों के ज़रिये तय किए जाते हैं। हमारी तस्वीरें हमारी होकर भी हमसे अलग बोलती हैं। हम अति-संपर्क के समाज में जी रहे हैं। संवाद अब ज़रूरत नहीं, एक आदत है— और आदत अक्सर सोच को खा जाती है। दिखना ज़्यादा ज़रूरी है, देखना लगभग ग़ायब हैं। हम रिश्तों के विस्तार के भ्रम में हैं, जबकि हर कोई अपने छोटे से कुएँ में खड़ा है— नदी होने का भ्रम पाले। वही चेहरे, वही आवाज़ें, उन्हीं को सच मान लेने की सुविधा। हम लगातार रौंदे जाते हैं, फिर खड़े हो जाते हैं— यह जाने बिना कि हर बार कुछ कम बचता है। ऑफ़लाइन होकर भी हम भीतर से ऑनलाइन रहते हैं। यह टापुओं की दुनिया है, जहाँ हम अपने जैसे लोगों में सबसे सुरक्षित महसूस करते हैं। यहीं सियासी जलदस्यु जन्म लेते हैं, और हम अनजाने में उनकी भीड़ बन जाते हैं। युद्ध कोई नई बात नहीं – युद्ध चल रहा है। युद्ध होगा। युद्ध पहले भी हुए थे। लेकिन युद्ध के नाम पर दिमा...
मैच शुरू होने से पहले रोनाल्डो का वह ऊँचा जंप। माइकल फेल्प्स का पानी में उतरने से पहले किया गया रिवर्स फ्लैप। मुहम्मद अली की आवाज़— “I am the greatest.” और उसेन बोल्ट का लाइटनिंग पोज़। ये शो ऑफ नहीं हैं। ये मानसिक स्टार्ट बटन हैं। इसे कहते हैं — Anchoring Effect। सुपर एथलीट्स जानते हैं कि दिमाग को हर बार मोटिवेट नहीं किया जाता, उसे प्रोग्राम किया जाता है। क्लासिक कंडीशनिंग पर हुए प्रयोग बताते हैं कि जब आप किसी खास भावना को बार-बार किसी खास ट्रिगर से जोड़ते हैं, तो कुछ समय बाद वह ट्रिगर अकेले ही वही भावना जगा देता है। जैसे स्विच ऑन करते ही लाइट जलती है। माइकल फेल्प्स कहते हैं — रिवर्स फ्लैप के बाद सब कुछ ऑटोमैटिक हो जाता है। मतलब? रिचुअल खत्म, मशीन शुरू। आप भी अपना “सक्सेस स्विच” बना सकते हैं — सिर्फ 3 स्टेप में: 1. Choose your emotion कौन सी फीलिंग चाहिए? कॉन्फिडेंस? फोकस? आक्रामक ऊर्जा? 2. Choose your trigger कोई पोज़, कोई शब्द, कोई गाना, कोई खास हैंड जेस्चर। 3. Practice Emotion + Trigger बार-बार उसी भावना को उसी ट्रिगर के साथ जोड़िए। दिमाग इसे लिंक कर लेगा। फिर एक दिन — स्टेज पर जाने...