लौटती हुई शुरुआत
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मैंने जाना है—
हमेशा एक नई शुरुआत की जा सकती है।
हर अंत
अदृश्य सीढ़ी पर रखा
पहला पाँव है।
अंधकार का भार
सिर्फ़ उतनी देर तक टिकता है,
जितनी देर प्रकाश
अपनी साँस भर रहा होता है।
हर कठिनाई का अंत सुनिश्चित है –
हर सुख का अंत भी सुनिश्चित है।
सुबह—
घड़ी की सुई नहीं,
बल्कि एक रहस्य है
जो हर बार
अलग चेहरे में लौटता है।
समाधान कोई उत्तर नहीं,
वह तो एक रंग है—
पहली किरण की लालिमा,
जो हर छाया को
धीरे-धीरे निगल लेती है।
कठिनाई का अंत?
वह अंत नहीं,
बल्कि एक दर्पण है
जिसमें जीवन
अपना अगला चेहरा देख लेता है।
— अविनाश पाण्डेय
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