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कल के साए में आज

कल के साए में आज
— अविनाश पाण्डेय

आसान नहीं होता,
किसी के जीवन में आख़िरी मुहब्बत बनना।
तुम्हें सिर्फ़ उसका आज नहीं,
उसका गुज़रा हुआ कल भी सँभालना पड़ता है—
वो पुरानी मोहब्बतें,
जिनकी खुशबू अब भी उसके कमरे की हवा में तैरती है।
उन कहानियों को सुनना होता है
जिनमें तुम्हारा कोई किरदार नहीं।
तुम्हें उसकी आँखों में
वो परछाईं भी देखनी होती है
जो तुम्हारी नहीं,
मगर अब भी वहाँ है।

तुम उसके साथ चलते हो
उन पगडंडियों पर
जहाँ उसके कदम पहले किसी और के साथ धंसे थे।
उसकी हँसी में, उसके स्पर्श में,
उसकी गंध में—
कहीं न कहीं, किसी और का मौसम
अब भी बचा होता है।

और तुम यह जानते हुए भी
कि उसका अतीत तुम्हारा नहीं,
उसके आने वाले दिनों में
अपना स्वाद, अपनी खुशबू, अपना स्पर्श
धीरे-धीरे घोलते हो—
जैसे कोई रात में, बिना आहट,
किसी ठंडे होते जिस्म को
अपनी धड़कनों की ऊष्मा से
फिर से जगा दे।

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