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अविनाश पाण्डेय। हवा। पूरब। मौन। अकेलापन। यात्रा। सागर। तन्हाई। लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अबकी बार यह पूरब से चलेगा

अबकी बार यह पूरब से चलेगा। •••••••••••••••••••••••••••••••• अच्छा या बुरा नही होकर एक वक्त हैं। जो वक्त बेवक्त खाली हो जाता हैं। उस खालीपन के अंदर कई मौसम एक साथ रहा करते हैं।  आज चमकती हुई धूप हैं। सर्द मौसम बहुत पास से गुजर रहा है। धूप निश्चिंत हैं कि अब सर्द मौसम बाधा नहीं बनेंगे, लेकिन बीच बीच में  बेमकसद भटकती असंतुष्ट बदली धूप को आशंकित करती हैं। इस आशंका को तब और बल मिलता हैं, जब हवाएं अट्टहास करती पास से गुजर जाती हैं।  शोर करता यह उद्वेलित मालूम पड़ता हैं जैसे बेमतलब का हो।  बेमतलब का होना इसे और जंगली बनाता हैं। उपेक्षा और तिरस्कार से सख्त हो चुका, यह लोगो को दर्द दे कर अपना गुस्सा निकालता है। अपनी पहचान खातिर बार–बार शोर करता अपनी मौजूदगी का अहसास कराता हैं।  लेकिन इन जाड़ों के बाद वाली धूप में तुम्हारा क्या काम?    वेग से गुजरती इन हवाओं को देख धूप थोड़ी देर के लिए ठिठक पड़ती हैं। जानी पहचानी लेकिन पहचान का कोई सिरा नजर नहीं आता। मिलने की खुशबू आ रही , लेकिन कैसे मिले थे याद नही!  हवाएं शिकायती और उम्मीद की मिलीजुली नजरों से धूप को ताक...