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जुलाई, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

Social homeostasis

जब बुद्ध वर्षों बाद ज्ञान प्राप्त करके पहली बार कपिलवस्तु लौटे, तो उनके पिता ने बुद्ध को नहीं देखा; उन्होंने उसी पुराने सिद्धार्थ को खोजा, जिसे वे पहचानते थे। कहते हैं, उन्होंने लगभग यही कहा—"यह कैसा भेष बना लिया है? अब लौट ही आए हो, तो इसे उतार दो। मैं तुम्हें माफ़ कर दूँगा।" यहीं से मनुष्य के मन का एक गहरा नियम सामने आता है—लोग आपके परिवर्तन का विरोध नहीं करते, वे अपनी परिचित दुनिया के टूटने का विरोध करते हैं। सामाजिक मनोविज्ञान बताता है कि हर समूह एक अदृश्य Social Homeostasis बनाए रखता है। हर व्यक्ति के लिए एक स्वीकृत पहचान, एक अनुमानित ऊँचाई और एक सुविधाजनक भूमिका तय हो जाती है। जब तक आप उसी दायरे में रहते हैं, आपको स्वीकार किया जाता है। लेकिन जैसे ही आपकी चेतना उस सीमा को पार करती है, प्रतिरोध शुरू हो जाता है। Leon Festinger की Social Comparison Theory के अनुसार, आपकी प्रगति अनायास ही दूसरों के लिए आत्म-मूल्यांकन का दर्पण बन जाती है। वहीं Status Threat बताता है कि जब किसी स्थापित पदानुक्रम को चुनौती महसूस होती है, तो वह अपने बचाव में प्रतिक्रिया करता है। और Pierre Bourdi...

मै कुछ कहना चाहता हूँ —सुनोगे?

मै कुछ कहना चाहता हूँ - सुनोगे?  पहले मै बातूनी था। जीभ ओवरटाइम करता था और दिमाग हड़ताल पर चला जाता था।  फिर चुप हो गया।  इस चुप और बातूनी के बीच हमेशा संघर्ष चलता रहता था। एक दिन इन दोनों के बीच सुलह हो गया। अब मैं दोनों के मध्य बैठ कर कुछ बोलना चाहता हूँ - सुनना पड़ेगा वरना मैं भी नहीं सुनूंगा। कुछ लोगों का हमेशा मेरे से एक शिकायत रहती हैं - फोन नहीं करते, उठाते नहीं। पास बैठो तो जल्दी भाग जाते हो। पता चलता हैं कि घर में हो और मिलते नहीं? तुम पकड़ाते ही नहीं? अब क्या बोलूं कि जब भी फोन उठाओ - आप सुनाने लगते हो अपनी कथा। जब भी पास बैठो - आपको अपनी सुनाने के अलावा दूसरे का सुनना आता नहीं।  आखिर जब सुनने का ही ऑप्शन हैं तो बेस्ट क्यों न सुने?  #joerogan को क्यों ना सुने, Dairy of a CEO क्यों ना सुने?  क्यों न सुने #RottenMango को और #modernwisdompodcast को?  तो भाई साहब हमने कोई ठेका नहीं ले रखा हैं आपके #हैलुसिनेशन और #डिसीज़_ऑफ_मी का!  अगर आपको कुछ बोलना हैं तो सुनना भी पड़ेगा।