"हवाओं पर लिखी गई स्त्री "
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प्रेम में अक्सर समझदारी खो जाती हैं।
खो जाते हैं पुराने चेहरे।
दुनिया सिमटकर एक आवाज़, एक छवि, एक छुअन में कैद हो जाती है।
प्रेम में डूबी स्त्री का संसार बदल जाता है।
वो भावनाओं की विशाल सरहद में,
नींद और जाग के बीच खुशहाल प्रेम और मुस्कुराते प्रेमी का सपना बुनने लगती है।
वो हवाओं से बातें करती है,
बुदबुदाकर मौसम की नाव से संदेश भेजा करती है।
वो चाहती है कि उसका प्रेमी कभी न हारे—
और उसे जिताने के लिए
अपना सर्वस्व दाँव पर लगा देती है।
वो हवाओं के संग उड़ना चाहती हुआ है –
कभी तेज, कभी मद्धम।
किसी ऐसी जगह जाना चाहती है
जहाँ उसकी भावनाओं का एक विशाल साम्राज्य हो—
बादलों का रंग-बिरंगे पंख लगाकर
वो जानना चाहती है कि उसका प्रेमी
कितनी दूर ले जा सकता है।
वो चिड़िया की तरह होती है—
उड़ान उसकी फितरत होती है,
आज़ादी उसकी साँसों में।
और वह चाहती है कि उसका प्रेमी भी
बदलते आसमान को छू ले,
उसके संग उड़ान भरे।
कल्पनाओं में तिनका-तिनका जोड़कर
वो एक महल बनाती है—
प्रेम के, प्रतीक्षा के, भविष्य के।
पर जब प्रेमी की आँखों में
अपने लिए वो चमक नहीं देखती—
तो स्तब्ध रह जाती है।
अंधेरों में उतर जाती है
एक अकेली प्रतीक्षा लेकर,
कि शायद उसका प्रेमी
फिर उन्हीं आँखों में प्रेम लिए लौटेगा।
पर उसका प्रेमी
प्रेमहीन आँखों से झूठ बोलता है।
और वह स्त्री—
टूट कर बिखर जाती है।
अपने ही हाथों से बिखेर देती है
वो तिनके, वो एक – एक कंकर-पत्थर,
जिनसे उसने अपने सपनों का महल रचा था।
अब वह स्त्री
एक नए रूप में जन्म लेती है।
उसके पर काट चुके प्रेमी की
आँखों में आँसू देखकर
वो खुश होती है।
वो जमाने के लिए कठोर होती जाती है—
एक आत्म-संरक्षित आग की तरह।
स्त्री का सख़्त हो जाना खतरनाक होता है—
और उसे सख़्त बनाने वाला,
सबसे बड़ा अपराधी।
Avinash Pandey
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