सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

वो जो हम पीछे छोड़ आए

कल के साए में आज
— अविनाश पाण्डेय

आसान नहीं होता,
किसी के जीवन में आख़िरी मुहब्बत बनना।
तुम्हें सिर्फ़ उसका आज नहीं,
उसका गुज़रा हुआ कल भी सँभालना पड़ता है—
वो पुरानी मोहब्बतें,
जिनकी खुशबू अब भी उसके कमरे की हवा में तैरती है।
उन कहानियों को सुनना होता है
जिनमें तुम्हारा कोई किरदार नहीं।
तुम्हें उसकी आँखों में
वो परछाईं भी देखनी होती है
जो तुम्हारी नहीं,
मगर अब भी वहाँ है।

तुम उसके साथ चलते हो
उन पगडंडियों पर
जहाँ उसके कदम पहले किसी और के साथ धंसे थे।
उसकी हँसी में, उसके स्पर्श में,
उसकी गंध में—
कहीं न कहीं, किसी और का मौसम
अब भी बचा होता है।

और तुम यह जानते हुए भी
कि उसका अतीत तुम्हारा नहीं,
उसके आने वाले दिनों में
अपना स्वाद, अपनी खुशबू, अपना स्पर्श
धीरे-धीरे घोलते हो—
जैसे कोई रात में, बिना आहट,
किसी ठंडे होते जिस्म को
अपनी धड़कनों की ऊष्मा से
फिर से जगा दे।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आंसुओं की आखिरी बूंद

आँसुओं की आख़िरी बूंद मनुष्य के लिए कोई पीड़ा शाश्वत नहीं। समय उसे काटता-तराशता है, जब तक कि दिल थककर उसे स्वीकार न कर ले। आँसू बहते हैं, फिर सूख जाते हैं। तन्हाई बोझ नहीं रहती, एक अनिवार्य साथी बन जाती है। जिन लोगों को खोया है, वे स्मृतियों में बदल जाते हैं। घाव भरते हैं, और टूटी उम्मीदें धीरे-धीरे अपनी चुभन खो देती हैं। — अविनाश पाण्डेय

Importance of smaller steps

चुप्पी और दूरी के बीच

जीवन में बहुत-सी बातें समझ से परे होती हैं। जैसे—क्या पहाड़ कठोर है, इसलिए नदियाँ उसे छोड़ गईं? या नदियाँ छोड़ गईं, इसलिए पहाड़ कठोर हो गया? जीवन की कुछ सच्चाइयाँ हमेशा धुंध में छिपी रहती हैं। हम उन्हें पकड़ना चाहते हैं, पर वे हमारी उंगलियों से फिसल जाती हैं। क्या पहाड़ का कठोर होना नदियों का दोष था, या नदियों का जाना उसकी नियति? ठीक वैसे ही जैसे रिश्तों में— कभी समझना मुश्किल होता है कि चुप्पी ने दूरी बनाई, या दूरी ने चुप्पी को जन्म दिया। –– अविनाश पाण्डेय