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भरोसे की नींद


भरोसे की नींद

दूसरे को चैन से सोते देख
मेरे भीतर भी अजीब-सी नमी उतर आती है।
मानो किसी ने दुनिया को बता दिया हो
कि शांति अभी मरी नहीं है,
भरोसे की गोद में कोई अब भी
निश्चिंत लेटा हुआ है।

किशोरों को खेलते देख
मेरा अपना बीता हुआ समय
हवा की तरह लौट आता है।

किसी घर में बुजुर्गों का मुस्कुराना,
मानो मुझे धरती पर स्वर्ग होने की गवाही देता है।

और जब कोई बच्चा
अपने पिता के कंधे पर झूमता है—
तो दृश्य ऐसा लगता है
जैसे कोई हरा-भरा पेड़ बरसात में
भीगकर कृतज्ञ हो गया हो।
वह झूमना केवल खेल नहीं,
भरोसे का उत्सव है।

ये सब क्षण
किसी किताब में लिखे प्रमाण नहीं हैं—
ये स्वयं जीवन की लिखावट हैं,
जहाँ आँखें और दिल मिलकर
एक ही बात कहते हैं:
यही है सच, यही है जीवन।

— अविनाश पाण्डेय

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