ऐसी तो कोई आह नहीं जीवन में इस जीवन में बचाने योग्य क्या है? बुझ गई न जो बन एक अधरों पर ऐसी तो कोई चाह नहीं जीवन में! खो गई न हो जो अंधकार में सहसा ऐसी ततो कोई राह नहीं जीवन में! पल भर जो अवलंब मुझे दे सकती ऐसी तो कोई थाह नहीं जीवन में! विचलित कर सकती जो नियति के कम को ऐसी तो कोई आह नहीं जीवन में इस जीवन में है क्या? जरा आंख खोला और गौर से देखो तुम्हारे हाथ खाली हैं। कितने ही भरे हों तो खाली हैं। सिकंदर के हाथ भी खाली हैं। इस दुनिया में लोग चाहे कितने ही धन से सजे हों, भीतर का मालिक जब तक जागा नहीं, भीतर के स्वामी से जब तक पहचान न हुई, तब तक सब धोखा है। रोओग एक दिन, पछलाओगे एक दिन। मौत जब द्वार पर आकर खड़ी होगी और सब छीन लेगी जिसे तुमने कमाया था; जिसे तुमने इतनी आकांक्षा से पकड़ा थज्ञ, इतनी आतुरता से पकड़ा था। जब सब छिन जाएगा तो तड़फोगे। मेरे देख, लोग मौत से नहीं डरते -डरते हैं, मौत जो छीन लगी उससे। मौत से तो डरोगी भी कैसे? पौ से तो पहचान ही नहीं है। अपरिचित से क्या डर? कौन जाने मौत अच्छी ही हो, मीठी हो! कौन जाने मौत और नए जीवन का द्वार हो! मौत से तो कोई ...