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प्रेम में मुस्कुराना

कृष्ण एक मुस्कुराता हुआ प्रेमी।
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प्रेम शब्द ही जैसे मुझे कृष्णा की तरफ खींच ले जाता हैं। कृष्ण का जीवन जैसे परमात्मिक जीवन। अच्छे बुरे का कोई चुनाव नही। एक छोर– जहां अच्छे और बुरे दोनों आकर मिलते हैं। 
 ओशो पुरम में प्रेम पर अक्सर चर्चा होती थी और प्रेम सिमट कर कृष्ण के ऊपर आ जाता था।
जैसे कृष्ण को परिभाषित नहीं किया जा सकता वैसे ही प्रेम को परिभाषित नहीं किया जा सकता, क्योंकि शब्दो से सत्य प्रकट नही हो सकता अपितु शब्दो से इसका आभास जरूर मिलता हैं। सबका एक मत था, चाहे वो अमेरिकन हो, यूरोपियन हो चाहे भारतीय। प्रेम परमात्मीक हैं। प्रेम का मतलब कृष्ण है। एक मुस्कुराता हुआ प्रेमी जिन्होंने प्रेम को जिया और अमर कर दिया। 
प्रेम मुक्त करता है। स्वतंत्रता लाता हैं। मुस्कुराहटे बड़ी करता हैं। ऐसे प्रेम को जीसस ने ईश्वर कहा हैं। बुद्ध ने ध्यान की अंतिम परिणीति कहा हैं। महावीर ने केवल्य का स्वभाव कहा।
 तभी तो कृष्ण ताउम्र मुस्कुराते रहे इसके वावजूद की वो गुकुल से दूर रहें। 
एक बार जो  प्रेम की गलियां छूटी फिर पलट कर देखा तक नहीं।
 शायद प्रेम नदी जितना पवित्र होता हैं। शायद प्रेम में नदी की तरह वापस मुड़ा नही जा सकता।  यादों को गहराई में समेटे बढ़ जाना ही  इसका स्वभाव हैं। 
राधा रोई कृष्ण मुस्कुराते रहे। प्रेम में तृप्त हुआ मनुष्य आगे बढ़ जाता हैं। 
प्रेम करना या होना बिना कारण होता हैं। अगर प्रेम में कारण खोज लिया जाए तो ये प्रेम नही होकर मोह बन जाता हैं। 
राधा रोई क्योंकि कृष्णा का फिक्र आंसु लाया था। मोह रुलाता हैं। पाने का अधिकार मोह उत्पन्न करता हैं। 
प्रेम तो खुद में मुक्त होता हैं। ना किसी पर कब्जा करता हैं और ना किसी को कब्जा करने देता हैं। 
ओशो का कहना था की प्रेम सुखी लकड़ी जैसा हैं। सुखी लकड़ी के जलने पर कोई धुआं नही उठता। अगर धुआं उठ रहा तो धुआं विजातीय हैं। लकड़ी अभी कच्ची हैं। गीली है। 
प्रेम से अगर आंखे अंधी हो रही हैं, धुआं पैदा हो रहा, जिंदगी पर कालिख लग रही हैं। क्रोध उत्पन्न हो रहा। ईर्ष्या जलन पैदा हो रही तो प्रेम में अभी बहुत कचरा हैं। निर्मोह करो प्रेम को, मोह धुआं पैदा करता है।
लाओत्से ने अपनी किताब में परमात्मा को बिना शब्दो के बांधे रखा है। मतलब अबूझ। जैसे प्रेम अबूझ होता हैं। 
 बारिश के दिनों में कच्ची दीवाल पर बन जाने वाली आकृति। जिसकी जैसी समझ वैसी कल्पना कर लेता हैं।
कृष्ण प्रकृति हैं। मतलब प्रेम प्रकृति है। इतना कठोर की कोई दया नही उनके पास आपके आंसुओ के लिए। कोई शब्द नही सांत्वना के। कोमल इतना की एक आह से तड़प उठे।

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