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आंसुओं की आखिरी बूंद

आँसुओं की आख़िरी बूंद मनुष्य के लिए कोई पीड़ा शाश्वत नहीं। समय उसे काटता-तराशता है, जब तक कि दिल थककर उसे स्वीकार न कर ले। आँसू बहते हैं, फिर सूख जाते हैं। तन्हाई बोझ नहीं रहती, एक अनिवार्य साथी बन जाती है। जिन लोगों को खोया है, वे स्मृतियों में बदल जाते हैं। घाव भरते हैं, और टूटी उम्मीदें धीरे-धीरे अपनी चुभन खो देती हैं। — अविनाश पाण्डेय

चुप्पी और दूरी के बीच

जीवन में बहुत-सी बातें समझ से परे होती हैं। जैसे—क्या पहाड़ कठोर है, इसलिए नदियाँ उसे छोड़ गईं? या नदियाँ छोड़ गईं, इसलिए पहाड़ कठोर हो गया? जीवन की कुछ सच्चाइयाँ हमेशा धुंध में छिपी रहती हैं। हम उन्हें पकड़ना चाहते हैं, पर वे हमारी उंगलियों से फिसल जाती हैं। क्या पहाड़ का कठोर होना नदियों का दोष था, या नदियों का जाना उसकी नियति? ठीक वैसे ही जैसे रिश्तों में— कभी समझना मुश्किल होता है कि चुप्पी ने दूरी बनाई, या दूरी ने चुप्पी को जन्म दिया। –– अविनाश पाण्डेय