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वह रेगिस्तान था रेगिस्तान ही रहा री

वह रेगिस्तान था रेगिस्तान ही रहा। लोग आते रहे, कदमों के निशान बनते रहे और आंधियां निशान मिटाती रही। 
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वह एक पहाड़ी लड़का था तो पहाड़ी लोककथा और लोकगीत सुनते हुए बड़ा हुआ था। सपने भी उसे हरा–भरा और रोमांच वाले ही आते थे। 
लेकिन अक्ल का दांत टूटते ही उसके सपने, दुस्वप्न में बदल चुके थे। सपनों का ऐसा डर की रात में सोने से डर लगे। नींद की गोलियों के असर से सपने रात भर के लिए सप्रेस्ड तो हो जाते थे लेकिन होश आने पर, दिन की रौशनी में उसकी काली परछाई चारों तरफ से घेरे  रहती। 
वर्षो बाद उसे फिर से वही दुस्वप्न दिखने लगे थे।
उसे ताज्जुब हो रहा था कि उसका जीना नया हैं, कर्म नया हैं और कर्म का कोई अतीत भी नही होता, फिर भी वर्षो बाद वही दुस्वप्न आ रहे हैं।  
वह एक पहाड़ की आसान सी चढ़ाई पर चढ़ रहा हैं। यह सूर्यास्त से ठीक पहले का समय है। पहाड़ की चोटी गाढ़ी रौशनी से नहाई हुई हैं। यह रौशनी डरावनी रूप में उसकी तरफ बढ़ रही है। पहाड़ की तलहटी में पानी की ठहरी हुई एक झील हैं, जो अस्त हो रहे सूरज के रंगों से झिलमिला रहीं हैं। अचानक अंधेरा हो जाता हैं। पहाड़ जीवन सा धड़कने लगता हैं। उसके नीचे की जमीन सागर की लहरों की तरह उछल रही हैं।  पैर उखड़ने लगते हैं। वह एक ऐसी झील में गिर रहा हैं  जिसका पानी काला हैं। फिर कुछ बचता नही सिवाय काली अंधेरों के सिवा। 
पहली बार जब ये दुस्वप्न दिखने शुरू हुए थे तो किसी ने सलाह दी थी कि पहाड़ की जगह रेगिस्तान की कल्पना किया करो। सपने आने बंद हो जाएंगे।
कल्पना के लिए वो रेगिस्तान की यात्रा पर था।
 पहाड़ पर पाला बढ़ा उसके अनुभव में सिर्फ हरियाली – फूलों की खुशबू और चिड़ियों की चहक थी। 
लेकिन रेगिस्तान को देख उसे पहली बार अनुभव हुआ की बिना चिड़ियों का आकाश कितना सुना लगता हैं। बिना चिड़ियों का आकाश नही होना चाहिए। 
विशाल खालीपन समेटे यह रेगिस्तान खुद अपने ताप में रोज झुलसता था। सैलानी आते थे, चहलकदमी करते थे, कदमों के निशान बनाते थे, रेत पर लेट कर पिक्चर लेते थे फिर खुद पर चिपक आए रेत को झाड़ चल देते थे। सैलानियों से भरे होने के वावजूद भी रेगिस्तान का अकेलापन स्थाई था। अकेलापन अकेले जीना पड़ता हैं कोई चाह कर भी बांट नही सकता। 
" क्या तुम्हे बुरा नही लगता"– उस लड़के ने रेत पर लेटे रेत से सवाल किया था।
जवाब में रेत ठहरी नजरो से देखा भर था। सुखी और कठोर आंखों में एक शैतानी चमक थी जो किसी को भी डरा सकता था।  
लड़के के अंदर और सवाल करने की हिम्मत नही बची थी।
रेत में सर टिकाए लड़का सोच रहा था – जिससे एक–एक कर  सब छीना जा रहा हो– उसका ‘मैं’, सुंदरता, मुस्कुराहट, पानी, हरियाली और गौरवपूर्ण अतीत– उस मरे हुए रूह में शैतान का घर होता हैं। उसका सख्त और क्रूर होना लाज़िमी हैं।
साल में एकाध बार रेगिस्तान विशाल महलों वाले गौरवपूर्ण अतीत को याद कर आंसू जरूर बहाता था। लेकिन हर आंसू उसे और मायावी और क्रूर बनाते थे। 
किसी भटक गए राहगीर को गलत रास्ता दिखाता। प्यासे को दूर सामने चमकीला झील होने का भ्रम देता और प्यासे के वहा पहुंचते ही रेत शैतानी ठहाके लगा, प्यासे को गोल गोल तब तक घुमाता जब तक प्यास से उसकी मृत्यु न हो जाती। 
कहावतों में प्रचलित था कि रेगिस्तान पर कभी भरोसा नहीं करना। यह मायावी और कठोर होता हैं।  इसे जादू टोना आता है। 
लेकिन क्या हमेशा से रेगिस्तान ऐसा ही था? हरगिज नही! गहरा समुंद्र हुआ करता था। लोग अपने फायदे के लिए समुंद्र को रेगिस्तान बना डाले और अब रेत से खेलने आते हैं। 
वह पहाड़ी लड़का अब शांत था। 
रात घिर आई थी। रेगिस्तान उस पहाड़ी लड़के के प्रति थोड़ा शीतल हो चला था। उसे अपना रहा था। कई रातों का जगा वह नींद के आगोश में था। 
 सपने फिर भी आए थे – सामने रेगिस्तान था , तुफानों के बवंडर में नाचता लड़के को भी अपने में समेट रहा था। दम घुटने लगे थे। उसे प्यास लगी थी। प्यास की महीन डोर गले को कस रही थी।  पानी की खोज में वो लड़का रेगिस्तान के अंदर तक घंसता जा रहा था। 
@अविनाश पाण्डेय

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