सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

हाथ खाली हैं।

ऐसी तो कोई आह नहीं जीवन में 
इस जीवन में बचाने योग्य क्या है?
बुझ गई न जो बन एक अधरों पर
ऐसी तो कोई चाह नहीं जीवन में!
खो गई न हो जो अंधकार में सहसा
ऐसी ततो कोई राह नहीं जीवन में!
पल भर जो अवलंब मुझे दे सकती
ऐसी तो कोई थाह नहीं जीवन में!
विचलित कर सकती जो नियति के कम को
ऐसी तो कोई आह नहीं जीवन में 

इस जीवन में है क्या? जरा आंख खोला और गौर से देखो तुम्हारे हाथ खाली हैं। कितने ही भरे हों तो खाली हैं। सिकंदर के हाथ भी खाली हैं। 

इस दुनिया में लोग चाहे कितने ही धन से सजे हों, भीतर का मालिक जब तक जागा नहीं, भीतर के स्वामी से जब तक पहचान न हुई, तब तक सब धोखा है। रोओग एक दिन, पछलाओगे एक दिन। मौत जब द्वार पर आकर खड़ी होगी और सब छीन लेगी जिसे तुमने कमाया था; जिसे तुमने इतनी आकांक्षा से पकड़ा थज्ञ, इतनी आतुरता से पकड़ा था। जब सब छिन जाएगा तो तड़फोगे।   मेरे देख, लोग मौत से नहीं डरते -डरते हैं, मौत जो छीन लगी उससे। मौत से तो डरोगी भी कैसे? पौ से तो पहचान ही नहीं है। अपरिचित से क्या डर? कौन जाने मौत अच्छी ही हो, मीठी हो! कौन जाने मौत और नए जीवन का द्वार हो!

 मौत से तो कोई पहचान नहीं है तो मौत से क्या डरोगे? फिर डर क्या है? असली डर यह है कि तुम्हें पता है, कितने ही अज्ञानी होओ, लेकिन इतनी प्रतीति तो तुम्हें है कि तुम्हारा धन, तुम्हारा पद, तुम्हारी प्रतिष्ठा, यह सब मौत छीन लेगी। इतना पक्का है। मौत क्या देगी उसका तो कुछ पता नहीं; लेकिन क्या छीन लेगी, यह बिलकुल साफ है। तुम जो हो सब छीन लेगी। तुमने जिस-जिस से तादात्म्य कर लिय वह सब छिन जाएगा। इससे घबड़ाहट होती है। मौत की घबड़ाहट नहीं है। यह मौत से भय नहीं है। यह तुम्हारी पकड़ से, तुम्हारे परिग्रह से, तुम कृपणता से भय पैदा हो रहा है। काश, तुम अपने ही हाथ मुट्ठी खोल दो, मौत का भय उसी क्षण तिरोहित हो जाता है। तुम पकड़ो नहीं, जिओ! गुजरो जिंदगी से! मगर पकड़ो मत।

ओशो

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आंसुओं की आखिरी बूंद

आँसुओं की आख़िरी बूंद मनुष्य के लिए कोई पीड़ा शाश्वत नहीं। समय उसे काटता-तराशता है, जब तक कि दिल थककर उसे स्वीकार न कर ले। आँसू बहते हैं, फिर सूख जाते हैं। तन्हाई बोझ नहीं रहती, एक अनिवार्य साथी बन जाती है। जिन लोगों को खोया है, वे स्मृतियों में बदल जाते हैं। घाव भरते हैं, और टूटी उम्मीदें धीरे-धीरे अपनी चुभन खो देती हैं। — अविनाश पाण्डेय

Importance of smaller steps

चुप्पी और दूरी के बीच

जीवन में बहुत-सी बातें समझ से परे होती हैं। जैसे—क्या पहाड़ कठोर है, इसलिए नदियाँ उसे छोड़ गईं? या नदियाँ छोड़ गईं, इसलिए पहाड़ कठोर हो गया? जीवन की कुछ सच्चाइयाँ हमेशा धुंध में छिपी रहती हैं। हम उन्हें पकड़ना चाहते हैं, पर वे हमारी उंगलियों से फिसल जाती हैं। क्या पहाड़ का कठोर होना नदियों का दोष था, या नदियों का जाना उसकी नियति? ठीक वैसे ही जैसे रिश्तों में— कभी समझना मुश्किल होता है कि चुप्पी ने दूरी बनाई, या दूरी ने चुप्पी को जन्म दिया। –– अविनाश पाण्डेय