सोशल मीडिया में हर व्यक्ति एक ब्रांड है—
ख़ुद से अलग दिखने की हड़बड़ी में
धीरे-धीरे एक जैसा होता हुआ।
बाहरी रूप ही सत्य है,
अंदर झाँकना अब अप्रासंगिक है।
हम शब्दों के ज़रिये मौजूद हैं,
तस्वीरों के ज़रिये तय किए जाते हैं।
हमारी तस्वीरें हमारी होकर भी
हमसे अलग बोलती हैं।
हम अति-संपर्क के समाज में जी रहे हैं।
संवाद अब ज़रूरत नहीं, एक आदत है—
और आदत अक्सर सोच को खा जाती है।
दिखना ज़्यादा ज़रूरी है,
देखना लगभग ग़ायब हैं।
हम रिश्तों के विस्तार के भ्रम में हैं,
जबकि हर कोई अपने छोटे से कुएँ में खड़ा है—
नदी होने का भ्रम पाले।
वही चेहरे, वही आवाज़ें,
उन्हीं को सच मान लेने की सुविधा।
हम लगातार रौंदे जाते हैं,
फिर खड़े हो जाते हैं—
यह जाने बिना
कि हर बार कुछ कम बचता है।
ऑफ़लाइन होकर भी
हम भीतर से ऑनलाइन रहते हैं।
यह टापुओं की दुनिया है,
जहाँ हम अपने जैसे लोगों में
सबसे सुरक्षित महसूस करते हैं।
यहीं सियासी जलदस्यु जन्म लेते हैं,
और हम अनजाने में
उनकी भीड़ बन जाते हैं।
युद्ध कोई नई बात नहीं –
युद्ध चल रहा है। युद्ध होगा।
युद्ध पहले भी हुए थे।
लेकिन युद्ध के नाम पर
दिमाग़ को थकाना
संवेदनाओं को कुंद करना ये चालबाजी हैं– जो आनलाइन दुनिया में चलचित्र की भांति चल रहा हैं।
सवाल यही है—
क्या हम सचमुच एक दूसरे से जुड़े हैं,
या बस ज़्यादा अकेले?
क्या यह जागरूकता है,
या अंध-श्रद्धा का नया संस्करण?
और सबसे असहज प्रश्न—
कहीं हम वही तो नहीं दोहरा रहे
जो हमें पहले से आता है– तमाशे देखना और ताली बजाना?
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