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संगत और जीवन

मनुष्य जिस संगत में अधिक समय बिताता है,
वह अनजाने में उसी जैसा होने लगता है।
पहले उसकी भाषा बदलती है,
फिर सोच,
और अंत में उसे अपने भीतर हो रहे बदलाव भी सामान्य लगने लगते हैं।
मैंने देखा है कि बुरी संगत इंसान को एक दिन में नहीं बदलती।
वह धीरे-धीरे उसकी संवेदनशीलता कम करती है।
गलत बातों पर भीतर उठने वाली बेचैनी को खत्म कर देती है।
फिर एक समय ऐसा आता है जब वही गलत चीज़ें आदत बन जाती हैं।
सबसे खतरनाक बात यह है कि इंसान को अपना पतन, पतन जैसा लगना ही बंद हो जाता है।
उसे लगता है कि यही उसका स्वभाव है।
और अब मुझे लगता है कि संगत सिर्फ लोगों की नहीं होती —
विचारों की भी होती है,
भीड़ की भी,
और उस वातावरण की भी,
जहाँ सत्य से अधिक सुविधा को महत्व दिया जाता है।
Avinash Pandey 

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