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जिन्दगी गोल गोल हैं

ज़िंदगी गोल-गोल है, जैसे पहिया—कल सच था, आज झूठ। प्रकृति अपने चक्र में हमें लगातार चौंकाती है। सोचिए, एवरेस्ट की चोटी की कठोर चट्टान और करोड़ों साल पहले समुद्र की गहराई में डूबी चट्टान—एक ही हैं।

सनातनी संत, महात्मा शंकराचार्य और उनके अनुयायी, इस पर कभी आश्चर्यचकित नहीं हुए। उत्तर उनके पास हमेशा मौजूद था—कल्प की शुरुआत में पृथ्वी सागर में डूबी थी। विष्णु का वाराह अवतार उसे उठाकर सृष्टि की नींव रखता है। यह कथा पद्मपुराण में विस्तार से वर्णित है।

वेद, उपनिषद, पुराण—सैंकड़ों हमले झेले, झूठा कहा गया, लेकिन संत मुस्कुराते रहे, दृष्टा बने रहे। आज वही विज्ञान, अपनी सीमित तर्क शक्ति में अहंकार में डूबा, उन्हीं पत्थरों को प्रमाणित कर रहा है।

और आज, गहराई और रहस्यों से भरी सनातन परंपरा को हिंदू धर्म के नाम पर दबाया जा रहा है। कुछ मुट्ठी भर राजनीतिक पाखंडियों के उकसावे पर, हम वही सनातनी हैं—जो धर्म का अध्ययन किए बिना उसका झंडा उठाकर ढोंग करते हैं।

याद रखिए—हम धर्म को नहीं बचाते; धर्म हमें बचाता है। धर्म अपनी रक्षा खुद करता है।

—अविनाश पाण्डेय

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