सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

डायरी

┌───────────────────────────── Untitled - Notepad ───────────────────────────┐
│ 24 जनवरी 2016 │
│ अविनाश पाण्डेय │
│ │
│ आज मैंने एक बात बड़े जोर से महसूस की — │
│ ज़िंदगी में स्पष्ट होना कितना जरूरी है। │
│ │
│ निर्णय लेना आसान नहीं होता हैं। │
│ कई बार उसकी कीमत चुकानी पड़ती है — │
│ रिश्ते टूट जाते हैं, मौके निकल जाते हैं, लोग आपको गलत समझते हैं।      
  
│ लेकिन जब भीतर का शोर थमता है, │
│ तब महसूस होता है — यही सही था। │
│ │
│ स्पष्ट मन से लिए गए फैसले │
│ हमेशा सुकून देते हैं। │
│ और यही सुकून भरा मन │
│ सही सोच और सही परिणाम देता है। │
│ │
│ फाइनेंस ने भी एक सबक सिखाया — │
│ पैसा चाहे जैसा हो– जिसका हो, पैसे का स्वभाव है, खर्च होना।                          
│                                                  
│                                                                            
│ सबसे बड़ा सबक — │
│ उधार मत लो │
│ जब तक हालात जान लेने की नौबत न बना दे। │
│ उधार की ज़िंदगी का कंपाउंडिंग तेज़ होता है │
│ और decay भी उतना ही तेज़। │
│ एक बार इस जाल में फँस गए, │
│ निकालना आसान नहीं। │
│ │
│ आज के लिए बस इतना ही– │
│ उमड़ते घुमड़ते विचारों को बाहर फेंक │
│ अब सोते हैं हिप्टोनाइज़ के साथ। │
└───────────────────────────────────────────────────────

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

लौटती हुई शुरुआत

लौटती हुई शुरुआत  ........................ मैंने जाना है— हमेशा एक नई शुरुआत की जा सकती है। हर अंत अदृश्य सीढ़ी पर रखा पहला पाँव है। अंधकार का भार सिर्फ़ उतनी देर तक टिकता है, जितनी देर प्रकाश अपनी साँस भर रहा होता है। हर कठिनाई का अंत सुनिश्चित है – हर सुख का अंत भी सुनिश्चित है। सुबह— घड़ी की सुई नहीं, बल्कि एक रहस्य है जो हर बार अलग चेहरे में लौटता है। समाधान कोई उत्तर नहीं, वह तो एक रंग है— पहली किरण की लालिमा, जो हर छाया को धीरे-धीरे निगल लेती है। कठिनाई का अंत? वह अंत नहीं, बल्कि एक दर्पण है जिसमें जीवन अपना अगला चेहरा देख लेता है। — अविनाश पाण्डेय

आंसुओं की आखिरी बूंद

आँसुओं की आख़िरी बूंद मनुष्य के लिए कोई पीड़ा शाश्वत नहीं। समय उसे काटता-तराशता है, जब तक कि दिल थककर उसे स्वीकार न कर ले। आँसू बहते हैं, फिर सूख जाते हैं। तन्हाई बोझ नहीं रहती, एक अनिवार्य साथी बन जाती है। जिन लोगों को खोया है, वे स्मृतियों में बदल जाते हैं। घाव भरते हैं, और टूटी उम्मीदें धीरे-धीरे अपनी चुभन खो देती हैं। — अविनाश पाण्डेय

"जहां मैं हूं"

 "जहाँ मैं हूँ" शुरुआत कहाँ हुई, ये मालूम था। एक रोशनी थी, एक रोशनी में आँख खुली। और अंत? वो भी साफ़ है। एक दिन सब बंद हो जाएगा। साँसें, आवाज़ें, ख्वाब—सब। इसमें कुछ नया नहीं है। जो चीज़ हमेशा अनजानी रही, वो था ये बीच का हिस्सा। यही हिस्सा सबसे मुश्किल था और सबसे सच्चा भी। इसी में मैंने खुद को खोया, और फिर पाया। बहुत कुछ चाहा था एक वक़्त में। भागा, टूटा, लड़ा, हँसा भी… पर जितना ज़्यादा चीज़ों का पीछा किया, उतना ही खुद से दूर होता गया था।  एक दिन बेचैन शहर के एक शांत दुपहरिया में अचानक से एक समझ हवाओं के साथ अंदर प्रवेश किया था —जिस चीज़ का पीछा करोगे, उसके आख़िरी सिरे पर तुम ही खड़े मिलोगे। वक़्त की रफ़्तार में घूमते-घूमते आदमी आखिर खुद के ही पास लौट आता है। बचने की कोई जगह नहीं है। जो मेरा हिस्सा हैं, वो मुझे समझेगा। वो मुझे ढूंढने की कवायद नहीं करेगा। समझ और खोज पर्यायवाची होते है।  वो शोर में नहीं ढूंढेगा मुझे। किसी ढलती धूप में मेरी चुप्पी पढ़ेगा। वो जानता होगा कि मैं वहीं हूँ—किसी पुराने गीत की तरह...किसी शाम के सन्नाटे में, या एक कप चाय के पहले घूँट में। ज़िंदगी कोई...