फोटो पुरानी हैं।
अब चेहरा उतना नहीं चमकता। भोलेपन की वे महीन लकीरें, जो कभी आंखों के किनारों पर खेलती थीं, धीरे-धीरे धुंधली पड़ गई हैं। हर पल आंखों में नाचने वाला वह ख्वाबी, शायराना मौसम—और थोड़ी-सी बदमाशियां—बर्फ की तरह पिघल कर कहीं बह गई हैं।
अब भरोसा जल्दी नहीं होता। संबंधों की लंबाई-चौड़ाई, उनका विस्तार—सब कुछ किसी अधूरी रेखा जैसा लगता है।
कुछ पुराने लोग विदा हो चुके हैं, कुछ से दिल का रास्ता ही नहीं मिलता, और कुछ को गले लगाने का मन नहीं करता।
जिंदगी का आधे से अधिक हिस्सा पीछे छूट चुका है। जो शेष है, उसके लिए मौन अधिक समझदारी लगता है।
कभी “नियति” शब्द सुनकर भीतर की आधुनिकता हंस देती थी—अब उसी शब्द में एक ठहरा हुआ विश्वास बस गया है।
रेगिस्तान की एक कहावत है—उजाले जरूरत से ज्यादा हों तो आंखें अंधी हो जाती हैं। शायद मेरे हिस्से में भी कभी रोशनी अधिक थी। अंधेरा भी होता है—इसका गुमान नहीं था।
पहाड़ों में लोग कहते हैं—अंधेरे की चोट मनुष्य को बिखेर देती है।
अब समझ में आता है—बिखरना ही शायद क्रम है। फिर खुद को समेटना, खामोशियों में बैठ कर अपनी किरचों को जोड़ना—और यह सिलसिला उम्र भर चलता रहता है।
बिखरने और समेटने के बीच एक ठहराव आता है।
और हर ठहराव के बाद हम थोड़ा-सा कहीं छूट जाते हैं।
यूँ ही ठहरते, बढ़ते, यादों को बटोरते, आंखों में अपने ही अक्स लिए—
एक दिन यात्रा चुपचाप समाप्त हो जाती है।
हमेशा के लिए।
Avinash Pandey
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