भारत का आदमी एंटरटेनमेंट चाहता है !
उसे डेवलपमेंट से मतलब नहीं है !
चाहे वह बाहरी डेवलपमेंट हो या भीतरी !
उसकी इंद्रियां रस चाहती हैं - उत्तेजक, रोमांचक रस ! विशेषकर मानसिक रस !
जैसे कुत्ता दिनभर बैठा हड्डी चबाता है, वैसे ही भारत का आदमी घंटों बैठा एंटरटेनमेंट चबाता है !!
वह न्यूज़ चबाता है, टेलीविज़न सीरियल चबाता है ! वेब सीरीज चबाता है ! रील्स चबाता है.
वर्चुअल गेम्स और पोर्न चबाता है !
कुछ नहीं है तो वह गुटखा, पान, सुपारी चबाता है !
स्वाभाविक है, जो चबाता है वह थूकता भी है !
तो जिस तरह वह जगह-जगह गुटखा और पान थूकता है, उसी तरह वह हर जगह अपने चबाए विचार भी थूकता है !!
धर्म चबा लिया.. तो धर्म थूकता है !
ज्ञान चबा लिया..तो ज्ञान थूकता है !
विचारधारा चबा ली.. तो विचारधारा थूकता है !
ख्याल रहे, थूकी वही चीज जाती है जो गुटकी नहीं जाती !!!
हम भोजन नहीं थूकते क्योंकि भोजन गुटक लिया जाता है ! भोजन पचा लिया जाता है !
पचा लेने से पोषण मिलता है, जो अंग लगता है!
हम लोग धर्म नहीं गुटकते, ज्ञान नहीं गुटकते !!
अगर गुटकते, तो वह पचता ! पचता तो अंग लगता, यानी चेतना को लगता !
किंतु चेतना का कोई पोषण तो कहीं दिखता नहीं ! वरना इतनी हिंसा, इतनी मारकाट, इतना वैमनस्य नही दिखता !
और दिमाग़ों में इतना जहर नहीं दिखता !!
हम धर्म को सिर्फ चबाते हैं, गुटकते नही !
ज्ञान को सिर्फ चबाते हैं, फिर थूक देते हैं, गुटकते नहीं!
इसीलिए हमारी चेतना को कोई पोषण नहीं मिलता !
हमें सिर्फ स्वाद से मतलब है, पोषण से नहीं !
हमें 'मज़ा' से मतलब है, 'ग़िज़ा' से नही !!
हमारी इस आदत को सभी "उच्च धूर्त" भली तरह जानते हैं ! फिर वह धर्मगुरु हो, कि नेता हो, कि न्यूज़ चैनल !
इसीलिए न्यूज़ चैनल, न्यूज़ नहीं दिखाते, वह एंटरटेनमेंट दिखाते हैं !
भारत में वही आदमी सफल है जो भारतीयों की इस चबाने की आदत को जानता हो !
यहां वही नेता सफल है जो उसे चबाने के लिए एंटरटेनमेंट दे !
वही धर्मगुरु सफल है जिसके आश्रम में ""एंटरटेनमेंट"" मौजूद हो !
..वही फिल्म सफल है जिसमें एंटरटेनमेंट हो !
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