जब बुद्ध वर्षों बाद ज्ञान प्राप्त करके पहली बार कपिलवस्तु लौटे, तो उनके पिता ने बुद्ध को नहीं देखा; उन्होंने उसी पुराने सिद्धार्थ को खोजा, जिसे वे पहचानते थे। कहते हैं, उन्होंने लगभग यही कहा—"यह कैसा भेष बना लिया है? अब लौट ही आए हो, तो इसे उतार दो। मैं तुम्हें माफ़ कर दूँगा।"
यहीं से मनुष्य के मन का एक गहरा नियम सामने आता है—लोग आपके परिवर्तन का विरोध नहीं करते, वे अपनी परिचित दुनिया के टूटने का विरोध करते हैं।
सामाजिक मनोविज्ञान बताता है कि हर समूह एक अदृश्य Social Homeostasis बनाए रखता है। हर व्यक्ति के लिए एक स्वीकृत पहचान, एक अनुमानित ऊँचाई और एक सुविधाजनक भूमिका तय हो जाती है। जब तक आप उसी दायरे में रहते हैं, आपको स्वीकार किया जाता है।
लेकिन जैसे ही आपकी चेतना उस सीमा को पार करती है, प्रतिरोध शुरू हो जाता है।
Leon Festinger की Social Comparison Theory के अनुसार, आपकी प्रगति अनायास ही दूसरों के लिए आत्म-मूल्यांकन का दर्पण बन जाती है। वहीं Status Threat बताता है कि जब किसी स्थापित पदानुक्रम को चुनौती महसूस होती है, तो वह अपने बचाव में प्रतिक्रिया करता है। और Pierre Bourdieu के अनुसार, हर सामाजिक संरचना अपने पुराने शक्ति-संतुलन और सांस्कृतिक पूँजी को बचाने का प्रयास करती है। इसलिए प्रतिरोध प्रायः आपकी उपलब्धियों के विरुद्ध नहीं, बल्कि आपकी बदली हुई पहचान के विरुद्ध होता है।
यही कारण है कि छोटे सामाजिक परिवेशों में यह प्रतिरोध और तीव्र दिखाई देता है। वहाँ लोग आपके वर्तमान से कम, आपके अतीत से अधिक परिचित होते हैं। वे आपके भीतर उस व्यक्ति को खोजते रहते हैं, जिसकी उन्हें आदत थी।
शायद इसलिए विकास का सबसे विश्वसनीय संकेत प्रशंसा नहीं, बल्कि प्रतिरोध है। जब आप अपनी पुरानी "औकात" की खोल तोड़ते हैं, तो दुनिया आपको नीचे खींचने की कोशिश इसलिए नहीं करती कि आप गलत हैं; बल्कि इसलिए कि आपका बदल जाना उनकी मानसिक स्थिरता को अस्थिर कर देता है।
लेकिन विकास की सबसे बड़ी कीमत यही है कि एक दिन आपको उन लोगों के लिए भी अपरिचित होना पड़ता है, जिन्होंने आपको सबसे पहले पहचाना था।
Avinash Pandey
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