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"जहां मैं हूं"






 "जहाँ मैं हूँ"

शुरुआत कहाँ हुई, ये मालूम था।
एक रोशनी थी, एक रोशनी में आँख खुली।
और अंत?
वो भी साफ़ है। एक दिन सब बंद हो जाएगा।
साँसें, आवाज़ें, ख्वाब—सब।
इसमें कुछ नया नहीं है।
जो चीज़ हमेशा अनजानी रही,
वो था ये बीच का हिस्सा।

यही हिस्सा सबसे मुश्किल था और सबसे सच्चा भी।
इसी में मैंने खुद को खोया, और फिर पाया।
बहुत कुछ चाहा था एक वक़्त में।
भागा, टूटा, लड़ा, हँसा भी…
पर जितना ज़्यादा चीज़ों का पीछा किया,
उतना ही खुद से दूर होता गया था।

 एक दिन बेचैन शहर के एक शांत दुपहरिया में अचानक से एक समझ हवाओं के साथ अंदर प्रवेश किया था —जिस चीज़ का पीछा करोगे,
उसके आख़िरी सिरे पर तुम ही खड़े मिलोगे।
वक़्त की रफ़्तार में घूमते-घूमते
आदमी आखिर खुद के ही पास लौट आता है।
बचने की कोई जगह नहीं है।

जो मेरा हिस्सा हैं, वो मुझे समझेगा। वो मुझे ढूंढने की कवायद नहीं करेगा।
समझ और खोज पर्यायवाची होते है। 
वो शोर में नहीं ढूंढेगा मुझे। किसी ढलती धूप में मेरी चुप्पी पढ़ेगा।
वो जानता होगा कि मैं वहीं हूँ—किसी पुराने गीत की तरह...किसी शाम के सन्नाटे में,
या एक कप चाय के पहले घूँट में।

ज़िंदगी कोई रिहर्सल नहीं है।
कोई "कट" नहीं मिलेगा।
जो किया, वो दर्ज़ हो गया।
जो जिया, वो अब इतिहास है।
और चाहकर भी उसे मिटा नहीं सकते।
बस समझ सकते हैं।
और आगे कुछ बेहतर जी सकते हैं।

और इस बीच के पन्नो में लिखी कहानी!
प्यार?
वो पहली बार नहीं होता।
पहली बार तो एक हल्की सी चिंगारी होती है—अधूरी, घबराई हुई।
असल प्यार तब होता है, जब तुम सबकुछ देख चुके होते हो,
और फिर भी रुकते हो।
आख़िरी बार प्यार करना—मतलब किसी के पास टिक जाना।
बिना शर्त, बिना शक,
बिना डर के।
शुरुआत और अंत किताब के कवर हैं।
पर असली कहानी, असली गहराई,
वो तो बीच में है—वहीं जहाँ मैं हूँ।
सचमुच का मैं।


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