रिश्ते का मुँह छुपाना
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मैंने देखा है,
प्राथमिकता से लेकर अनदेखा होने तक का सफ़र,
"तुम मेरे सब कुछ हो" से लेकर
"तुम होते कौन हो" तक का सफ़र,
"तुम्हारी बातें बहुत अच्छी लगती हैं" से लेकर
"अब ज़रूरत नहीं रही" तक का सफ़र।
ये सफ़र दरअसल गिरने का था—
रिश्ते के भार से, उम्मीदों की ऊँचाई से,
अपने ही बनाए यक़ीन से।
अख़िर में बचा क्या?
न तुम्हारी नज़दीकी, न मेरी शिकायत,
बस एक चुप्पी—
जो सब कुछ कहकर भी
कुछ नहीं कहती।
— ✍️ अविनाश पाण्डेय
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