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मेरे कृष्णा

कृष्ण!
क्या अद्भुत चरित्र हैं!
दुनिया के सारे किरदार एक तरफ, और महाभारत के कृष्ण अकेले एक तरफ।
हर उम्र को उसकी संपूर्णता में जी लेने वाला एक अकेला मनुष्य—
नटखट बचपन, सहज किशोर,
प्रेम को अमर कर देने वाला प्रेमी,
मित्रता को तीर्थ बना देने वाला मित्र।

कभी रणभूमि में सारथी, तो कभी रण से दूर रहकर रण का नायक।
निहत्थे होकर साम्राज्यों को उखाड़ फेंकने वाला योद्धा।
धर्म को उसके असल रूप में खड़ा कर देने वाला सम्राट।
राग-द्वेष से परे, सुख-दुख से परे,
अपनी हर हार को भी धर्म का श्रृंगार बना देने वाला।

कितनी बार आरोप लगे उस पर—
जन्म से पहले ही मां को बंदी बना लिया गया,
जन्म लिया तो पालनहार बने गोकुल के लोग,
वहां से भी चला गया।
हर जगह से चल देना पड़ा कृष्ण को—
मथुरा, द्वारका, कुरुक्षेत्र—
जहां-जहां गया, हर जगह अधूरापन छोड़ आया।

राधा अब भी यमुना किनारे बैठी है—
कान्हा लौटेगा, इसी आस में।
मां-बाप ने देखा ही क्या उसका बेटा?
पांडव कहते हैं—
कृष्ण! तू था फिर भी हमें वन-वन भटकना पड़ा।
गांधारी कहती है—
तेरे होते मेरे सौ पुत्र मर गए!
रुक्मिणी, सत्यभामा, मित्र—
सबके उलाहने, सबकी शिकायतें—
और कृष्ण बस मुस्कुरा देते हैं।
कैसा विलक्षण धैर्य है!
कितनी अद्भुत शांति!

मृत्यु भी थकावट बन कर आई—
अपनों के विनाश का बोझ लिए
कृष्ण एक पेड़ के नीचे लेटे हैं।
एक शिकारी का तीर आता है—
पांव में लगता है।
कृष्ण न कोई प्रतिकार करते हैं, न कोई शिकायत—
प्रकृति का ऋण चुकता करते हैं।
जीवन से कोई व्यक्तिगत मोह नहीं,
किसी से कोई क्षोभ नहीं।
जो किया, धर्म किया—
जो सहा, सहज सहा।

कृष्ण हमें सिखाते हैं—
हर चीज़ से परे जाकर भी जीवन को निभाना,
हर आरोप को धारण कर लेना,
किसी से कोई हिसाब न मांगना,
निडर, निर्विकार, निरलेप।
यथार्थ को गले लगाकर
उससे प्यार करना ही कृष्ण होना है।
जो कर सके वही कृष्ण हो सकता है—
जो राग-द्वेष से ऊपर उठ सके,
लोभ-लालच को छोड़ सके,
जीवन को समर्पण बना सके,
और मुस्कुरा सके—
हर हार के बाद भी।

   –अविनाश पाण्डेय 

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