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मेरी तीन साहित्यिक रचनाएं।

"मेरी तीन साहित्यिक रचनाएं"
                 
 1

।।समय के खुरदरे काग़ज़ पर।।

किसी ने एक रेखा खींची थी
शब्द नहीं थे,
लेकिन अर्थ भारी थे — जैसे पुराने जूतों में भरी हुई यात्रा

काँपती लौ ने कहा —
मैं बुझूँगी नहीं
जब तक भीतर की अंधेरी बात
ख़ुद को कह न ले

हर दीवार पर
कोई पुराना धब्बा है
जो कहता है —
यहाँ कभी कोई रोया था, चुपचाप

पेड़ हवा से पूछता है —
क्या गिरना ही मेरा उत्तर है?
हवा कहती है —
गिरते हुए ही बीज बनता है

कुछ सन्नाटे
बहुत दूर से आते हैं
जैसे किसी पुराने संवाद की
अबूझ गूँज

और हम —
अपनी ही परछाई में
हर रोज़ कुछ खोते हैं
जैसे प्यास, पानी के पास होकर भी
कम हो जाती है

तो अब
अपने भीतर उतरना सीखो
जैसे जल में जल उतरता है
बिना आवाज़, बिना नाम

और जब लौटो —
तो अपने साथ
थोड़ी ख़ामोशी लेकर लौटो
ताकि दुनिया को
कभी खुद से सुनने की आदत पड़ जाए।
    
 अविनाश पाण्डेय 

---
2

|| यादों की कोठरी ||

एक पुरानी कोठरी है
दिमाग़ के सबसे पीछे
जहाँ धूल नहीं जमती
सिर्फ़ साँसें ठहरी रहती हैं

वहीं पड़ी है
वो हँसी जो अधूरी रह गई थी
एक गिलास — आधा पानी, आधा इंतज़ार
और एक पत्र — जिसमें नाम मिट चुका है

यादें चीज़ें नहीं होतीं
वे हवा की तह में छुपी
एक पुरानी गंध होती हैं
या चाय के कप में बचा
वो आख़िरी घूँट, जो कोई पी नहीं पाया

कुछ शामें लौट आती हैं
किसी पुराने गाने की तरह
जिसे सुने तो थे
मगर समझा बहुत बाद में

एक खिड़की थी उस घर में —
खुलती थी पश्चिम की ओर
अब वो घर नहीं रहा
पर वो दिशा अब भी भीतर खुलती है

यादों को सहेजना
जैसे धूप को हथेली में भरना
वो जलती नहीं
पर थोड़ी देर तक
हमारे भीतर सब कुछ रोशन कर जाती है

और जब हम थक जाते हैं
तो वही कोठरी
एक चुप्पी बनकर
हमारे सिरहाने बैठ जाती है
जैसे कोई पुराना दोस्त
कुछ न कहकर भी
सब कह देता है।

--- अविनाश पाण्डेय

3

|| पत्थर बोला पानी से ||

पत्थर बोला पानी से —
मैं स्थिर हूँ, तू क्यों बहता है?
पानी हँस पड़ा —
तू भीतर का कंपन नहीं जानता

टहनियाँ झुक रही हैं
लेकिन जड़ें गीत गा रही हैं
हर झुकाव के नीचे
एक इनकार की गूँज होती है

दिशाएँ भी कभी-कभी थक जाती हैं
और हवाओं से पूछती हैं —
क्या लौटना भी एक यात्रा है?
या सिर्फ़ एक और भूल?

एक आँख, दूसरी आँख में
रात भर उजाला उगाती है
नींद कोई समाधान नहीं —
वो तो बस एक और प्रश्न की देहरी है

छायाएँ अब बात नहीं करतीं
वे बस दीवारों पर
अपने पुराने प्रश्न चिपकाती हैं
जैसे कोई भूला हुआ वादा

कभी-कभी,
कंधों पर रखा हाथ
पूरी पृथ्वी जैसा भारी होता है
और मुस्कान —
केवल एक सूती पर्दा, भीगे हुए दुःख पर

इसलिए,
चुप रहो —
जैसे मिट्टी चुप रहती है बीज के इंतज़ार में
जैसे कल चुप रहता है
आज की साँसों में

और जब बोलो —
तो अपने भीतर के मौसम से बोलो
ताकि आवाज़ में
कोई दिशा काँप उठे।

अविनाश पाण्डेय 
––––––––


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