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उस आखिरी बूंद तक

" उस आखिरी बूंद तक"
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‘Ex बार’ वो जगह थी जहाँ हम अक्सर मिलते थे —
कम रोशनी, धीमा संगीत, और शराब की गंध में डूबी कुछ अधूरी कहानियाँ।

मैं और वह आमने-सामने बैठते, लेकिन हमारे बीच जो सबसे गहरी चीज़ होती — वो कभी मेज़ पर नहीं रखी जाती।
वह वाइन धीरे-धीरे पीती थी, जैसे हर घूंट में कोई भूली हुई याद घुल रही हो।
मैं जैकब्स क्रीक में अपनी चुप्पी डुबोता रहता —
क्योंकि कुछ बातें सिर्फ़ जलती हैं, कही नहीं जातीं।

"कभी सोचा है, अगर हम पहले मिलते?" उसने पूछा, लेकिन उसकी आँखें कहीं और थीं।
"शायद तब भी कुछ छूट जाता," मैंने कहा।
क्योंकि आरज़ू वक़्त की मोहताज नहीं होती,
वो तो बस छूट जाने के लिए पैदा होती है।

उसने हँसते हुए सिर झटक दिया —
वो हँसी नहीं थी, वो थक कर हथियार डाल देने जैसा कुछ था।

बार की खिड़की के बाहर बारिश गिर रही थी —
हम दोनों जानते थे, हम बच सकते थे,
लेकिन भीगना ज़्यादा सच्चा लग रहा था।

वो उठी, और जाते-जाते अपनी खाली ग्लास को एक तरफ सरका दिया —
जैसे कोई अधूरी बात, जो फिर कभी नहीं पूछी जाएगी।
मैं वहीं बैठा रहा — उस गिलास में ठहरी आख़िरी बूँद के साथ,
जिसमें उसका जाना अब भी थोड़ा बाक़ी था।

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