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हमारी आख़िरी मुलाक़ात कभी नहीं हुई।
और शायद हो भी नहीं सकती थी।
हम बस मिलते रहे—जैसे दो लोग जो जान चुके हैं कि बात अब आगे नहीं जाएगी,
फिर भी बोलते हैं,
जैसे कोई दास्तान जो रुकने से पहले अपना एक वाक्य पूरा करना चाहती है।
वो हर बार नज़रें चुरा लेती,
और मैं हर बार यही चाहता कि वो देखे—एक बार।
मुझे नहीं,
मेरे भीतर जो बाक़ी था उसे।
मुझे ग़ुस्सा आता था,
बहुत।
जैसे कोई ताले में हाथ मार रहा हो
जिसकी चाबी किसी और की जेब में चली गई हो।
बाद में समझ आया—
उसने नज़रें चुराईं नहीं थीं,
वो बस कहीं और देखने लगी थी।
शायद अब उसकी शामों में
कोई और कॉफ़ी मंगवाता होगा।
किसी और की बातों पर वो उसी तरह सिर झुकाकर हँसती होगी,
जैसे कभी मेरे शब्दों की छाँव में हँसी थी।
मैं जानता हूँ,
उसने कभी मुँह फेरकर मुझे छोड़ा नहीं।
वो तो बस धीरे-धीरे
किसी और के साथ रहने लगी थी—
उसी ख़ामोशी में,
जिसमें हम दोनों एक वक़्त में
एक-दूसरे से दूर होने लगे थे।
हमारी आख़िरी मुलाक़ात नहीं हुई—
पर जो नहीं हुआ,
वही सबसे सच था।
क्योंकि कुछ रिश्ते
एक दरवाज़ा नहीं,
एक खिड़की बनकर छूट जाते हैं—
जिससे हम देखते हैं,
कि वहाँ अब कोई और बैठा है
जहाँ एक वक़्त में
हम थे।
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