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रेगिस्तानी शाम

"चुप्पियों वाली वो रेगिस्तानी शाम "
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वो कोई ख़ास दिन नहीं था।
न कोई मौसम बदला था,
न कोई रिश्ता टूटा था।
फिर भी शाम अजीब थी —
जैसे कुछ सूख गया हो भीतर।

वो शाम किसी दिन की थकान भी नहीं थी,
वो एक उम्र की चुप्पी थी
जो धीरे-धीरे आकर
रेत की तरह सब पर फैल गई थी।

आसमान कुछ नहीं कह रहा था,
फिर भी उसमें कुछ टूट रहा था —
शायद उजाला।

उसकी नीरवता इतनी सघन थी
कि अगर किसी ने साँस भी ली होती,
तो वो भी एक अपराध लगती।

चुप्पियों वाली वो एक रेगिस्तानी शाम थी।

रेगिस्तान में शामें अचानक नहीं आतीं —
वो रेंगती हैं,
जैसे कोई पुरानी याद
धीरे-धीरे दिल पर चढ़ती जाती है।

और जब तक तुम्हें एहसास हो,
तुम उस चुप्पी के बीच अवाक पाए जाते हो,
जहाँ खुद से आँख मिलाने की हिम्मत भी नहीं होती।

इस चुप्पी में कोई संवाद नहीं होता —
फिर भी हर चीज़ बोल रही होती है।

एक टूटे हुए वक़्त की सरगोशियाँ,
एक अधूरे आदमी की साँसें,
एक खोई हुई उम्मीद की गंध...
सब कुछ हवा में है,
पर कुछ भी थामा नहीं जा सकता।

वो अपने साथ एक बोझ लाती है,
जो न कांधे पर रखा जा सकता है,
न किसी से बाँटा जा सकता है।

कभी-कभी ऐसा होता है —
कि वक़्त, जगह और मन —
सब मिलकर एक खालीपन रचते हैं।

ऐसा खालीपन जिसे न भरा जा सकता है,
न भुलाया।

—— Avinash Pandey 

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