सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

नीला पहाड़

नीला पहाड़
-----------------
नदी का पानी हर चीज को अलविदा करते आगे बढ़ता  जाता हैं। गांव, घर, चेहरे, हरेभरे मैदान, सूखे पेड़, उजाड़ रेगिस्तान, पहाड़, और किसी की प्यासी आंखे! सभी को अंतिम विदा करते बस बढ़ता ही जाता है। 
यह जानते हुए भी कि आगे बढ़ना लगातार कुछ खोते जाना हैं। अकेले होते जाना है। मैं भी बस चल पड़ा हूं। 
किसी दिन जब अंधेरा भारी होता हैं और चांद दिखता नहीं तो हम अनमने हो अनिश्चय में धीरे-धीरे बढ़ने लगते हैं। उस रात भी वैसा ही अंधेरा पसरा था। हर कदम के बाद अंधेरा और घना होता जा रहा था। 
अंधेरों में जब मौन पसरा हो तो वह अंधेरा डरावनी और रहस्यमई लगने लगती है।
कोई ओर ना छोर! कहां जा रहे पता नहीं। कहां जाना है निश्चित नहीं।  
वो रात भी ऐसी ही थी- अंधेरा किसी अजगर कि भांति मुझे निगल जाना चाहता था। अंधेरों में खोता जा रहा था- शून्य सा! 
लड़खड़ाते कदम रुकता जा रहा था और सामने दिख रहा नीले पहाड़ कि भांति बस जम जाना चाहता था। 
मै भी उस नीले पहाड़ कि तरह ही कभी था। अनसुलझा, बेपरवाह, पूरब से चलने वाली हवाओं के साथ उड़ने वाला। सुंदर! मुस्कुराता हुआ हरा भरा। सूरज की रौशनी से लाल - उजला - काला- सुनहरा- गुलाबी होता रहता था। शाम ढलते ही कई रंगों को एक साथ
 ओढ़ रंगीन हो जाता था। रात की रानी अंधेरों में चुपके से आकर मुझे थपकी दे एक प्यारी नींद सुला जाती थी। 
सामने दिख रहा नीला पहाड़ अब बदल चुका हैं - जो ठंडी आधी रात को कोहरे से भस्म हो चला हैं। वक़्त की धुंध में अपने कई हिस्सों को खो चुका हैं। और कुछ अभी भी धीरे-धीरे खोता जा रहा, अपने आप से दूर होता जा रहा है। तूफानी धूल उड़ाती हवा के साथ उसका भी कुछ हिस्सा रोज टूट रहा हैं। वे  हिस्से जो टूटते जा रहे हैं... शायद वे अनुपयुक्त थे। वे शायद बाकी बचे  सह अस्तित्व के लिए अनुकूल नहीं थे। 
मै भी चलते-चलते कुछ ना कुछ खोता जा रहा हूं। ये हवाएं और तूफान मेरे गौरवशाली ढांचे से टकराता है। अप्राकृतिक ढांचे को उड़ा लेे जाता हैं। मुझे भी कुछ दूर तक धक्के दे साथ में उड़ा ले जाता हैं। और फिर मुझे केवल मेरे सच्चे अवषेशों के साथ छोड़ जाता हैं। मेरी आंखे बंद हो जाती हैं और उस समय को याद करती हैं जब मैंने अपने से खुद को बहुत बड़ा महसूस किया था। 
पास ही कहीं खाई में जम चुकी काई के ऊपर गिरते पानी का शोर मेरी आंखो को खोलता हैं और मै उस खाई में गिरने से बच जाता हूं। 
और उतर कि तरफ मुड़ते हुए पहाड़ियों के रहस्यों के साथ आगे बढ़ जाता हूं।
आंखे रहस्यों से तब भी बंद हो ही जाती है।

© अविनाश पांडेय

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

लौटती हुई शुरुआत

लौटती हुई शुरुआत  ........................ मैंने जाना है— हमेशा एक नई शुरुआत की जा सकती है। हर अंत अदृश्य सीढ़ी पर रखा पहला पाँव है। अंधकार का भार सिर्फ़ उतनी देर तक टिकता है, जितनी देर प्रकाश अपनी साँस भर रहा होता है। हर कठिनाई का अंत सुनिश्चित है – हर सुख का अंत भी सुनिश्चित है। सुबह— घड़ी की सुई नहीं, बल्कि एक रहस्य है जो हर बार अलग चेहरे में लौटता है। समाधान कोई उत्तर नहीं, वह तो एक रंग है— पहली किरण की लालिमा, जो हर छाया को धीरे-धीरे निगल लेती है। कठिनाई का अंत? वह अंत नहीं, बल्कि एक दर्पण है जिसमें जीवन अपना अगला चेहरा देख लेता है। — अविनाश पाण्डेय

आंसुओं की आखिरी बूंद

आँसुओं की आख़िरी बूंद मनुष्य के लिए कोई पीड़ा शाश्वत नहीं। समय उसे काटता-तराशता है, जब तक कि दिल थककर उसे स्वीकार न कर ले। आँसू बहते हैं, फिर सूख जाते हैं। तन्हाई बोझ नहीं रहती, एक अनिवार्य साथी बन जाती है। जिन लोगों को खोया है, वे स्मृतियों में बदल जाते हैं। घाव भरते हैं, और टूटी उम्मीदें धीरे-धीरे अपनी चुभन खो देती हैं। — अविनाश पाण्डेय

"जहां मैं हूं"

 "जहाँ मैं हूँ" शुरुआत कहाँ हुई, ये मालूम था। एक रोशनी थी, एक रोशनी में आँख खुली। और अंत? वो भी साफ़ है। एक दिन सब बंद हो जाएगा। साँसें, आवाज़ें, ख्वाब—सब। इसमें कुछ नया नहीं है। जो चीज़ हमेशा अनजानी रही, वो था ये बीच का हिस्सा। यही हिस्सा सबसे मुश्किल था और सबसे सच्चा भी। इसी में मैंने खुद को खोया, और फिर पाया। बहुत कुछ चाहा था एक वक़्त में। भागा, टूटा, लड़ा, हँसा भी… पर जितना ज़्यादा चीज़ों का पीछा किया, उतना ही खुद से दूर होता गया था।  एक दिन बेचैन शहर के एक शांत दुपहरिया में अचानक से एक समझ हवाओं के साथ अंदर प्रवेश किया था —जिस चीज़ का पीछा करोगे, उसके आख़िरी सिरे पर तुम ही खड़े मिलोगे। वक़्त की रफ़्तार में घूमते-घूमते आदमी आखिर खुद के ही पास लौट आता है। बचने की कोई जगह नहीं है। जो मेरा हिस्सा हैं, वो मुझे समझेगा। वो मुझे ढूंढने की कवायद नहीं करेगा। समझ और खोज पर्यायवाची होते है।  वो शोर में नहीं ढूंढेगा मुझे। किसी ढलती धूप में मेरी चुप्पी पढ़ेगा। वो जानता होगा कि मैं वहीं हूँ—किसी पुराने गीत की तरह...किसी शाम के सन्नाटे में, या एक कप चाय के पहले घूँट में। ज़िंदगी कोई...