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वे पुराने दिन

दिन गुजर गए, हम किधर गए, पीछे मुड़ कर देखा तो पाया, सब ठहर गए। 
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इस साल की कुछ आखिरी घंटे बचे हैं। ये आखिरी कशमकश, कसमसाहट पीछे लिए जा रही है। विदा होने की बेचैनी ढेर सारा बात करना चाहती हैं। बहुत कुछ याद करना चाहती है। उसे भी जिसपर धूल जम चुके है मगर कभी सीने से लगा रखे थे। वे अजनबीपन से शुरू हुआ सफर, वे गलियां, बाज़ार की ट्रैफिक, धीमी रोशनी वाली टेबल, उसकी हड़बड़ाहट।  सफर के बाद की ताजगी। उसकी मुस्कुराहट। सुबह के ओस में भीगी उसकी कोमलता। उसके साथ मिलने वाला सुकून।  खिलखिलाता हुआ दिन, वो चांद वाली चमकती रात। रात में शहर का खाली हो जाना। चांद भी परेशान कि आखिर देर रात तक जागता कौन है? और सोता कौन है? -आसमान। वे नींद से खाली रातें- काली- डरावनी रात। दोपहर की तपिश। ठंड की ठिठुरन और सूनी रातें। बरसात में उसका भीगना और उस पानी का मेरी आंखो में आना! कितना कुछ छूट रहा। अकेला खड़ा बादल की तरह मैं इस बचे हुए कुछ घंटो को पकड़ने खातिर बरस पड़ा हूं। 
अन्तिम मुलाकाते, आखिरी बार पीछे मूड कर देखना पास खींच लाता हैं। मैं पीछे-पीछे हो लेता हूं। शायद उसे जाने देना नहीं चाहता। संवेदना चरम पर होती है, तब उसके पांव भी धीमे पड़ने लगते है। मगर जाने देना भी प्रेम है। 
ये आखिरी घंटे बस इतना ही कहना चाहते है- हमारे प्यार को इस शहर से कभी जुदा मत करना।
 अजनबी सफर कि शुरुआत अधूरेपन के साथ होने वाली है। और इश्क़ में अजनबी ना रहे तो इश्क कैसा? अधूरेपन के साथ वाला सफर भी इतना खाली होता है कि अपने अंदर कुछ जोड़ने का ख्याल भी बेचैन कर जाता हैं। आखिर कोई अपनी तन्हाई यूं ही हाथ से नहीं जाने देना चाहता। 
इन आखिरी बचे कुछ पलों को पता है कि उन्हें चुप-चाप बिदा हो जाना है, जैसे पेड़ से पते कहीं खो जाते है- बिना किसी पछतावा के।  
आखिरी बचे कुछ घंटे मेरे साथ खामोश हो चले है। इश्क में खामोशी ही बोलती है।

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