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पता नहीं किस मोड़ से गुजर कर इस मोड़ पर चलें आए।

पता नही किस मोड़ से गुज़र कर इस मोड़ पर चलें आए। 

शब्दों की है यह दुनियां। शब्दों से बने हम और आप।
शब्द हैं पहचान— गहरी या उथली। उजली या काली। खोखली?
शब्द – जैसे हम बोलना सीखते हैं वैसे ही एक– एक शब्दों को मार,  खामोश होना सीखते हैं। सबसे पहले जाती हैं हंसी की आवाज, खिलखिलाना, किसी को पुकारना... पसरती सन्नाटा और अंततः  खामोश हो जाते हैं। 
एक हंसता खेलता रोता शब्द एक दिन अचानक से खामोश हो जाता हैं। खो जाती हैं सारी आवाज़ें। आवाजें जो बंद खिड़की को खोलती थी, हसरतों की लाल किरण को अंदर लाती थी। सपने बुनती थी। शिकायते करती हुई गुस्से से लाल हो पश्चिम में धीरे धीरे डूब जाया करती थी।
शब्द जब अचानक से खो जाते हैं तो ऐसे में किसे पता हैं – वो रौशनी में घुली आवाज़ें किन बंद दरवाजों को खोलती थी। किसे पता हैं, आवाज़ें बन किस  हंसी को बाहर खींच लाती थी।  
मगर ये शब्द अचानक से नही मरते– खामोश नही होते। खामोश होने से पहले शोर करते है। दिमाग को फाड़ देने वाला शोर। यह शोर भी एक प्रश्न होता हैं कि क्या बोले या बोलने का क्या सार! 
और जब ये शब्द खामोश हो जाते हैं। नज़र आता हैं रेगिस्तान – विरान खालीपन। पहाड़ी धुंध।  
और उस पार क्या दिखता हैं! 
 स्वयं के अंदर आती–जाती सांसे? 
शब्दों के पार बड़ी क्रूर दुनियां होती हैं।
बड़ी सुक्ष्म, निर्मम। शब्द दाग देता हैं सैकड़ों बाण। अपने ही मन को सैकड़ों टुकड़ों में बांट, घायल हो नीले आसमान को निहारता जाता हैं। आसमान में आवारगी करता जिद्दी बादल के साथ हो लेता हैं। इधर उधर मंडराता,  हवाओं के तेज झोंके में उलझ बरसते हुए मन को आखिरी विदाई दे रहा होता हैं।   
 शब्दों की मौत – स्वयं की समाप्ति। उन सभी चीजों की समाप्ति जो इन शब्दों के ऊपर बने थे।
 

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